Thursday, April 16, 2015

क्या है स्वास्थ्य की परिभाषा


विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सन १९४८ में स्वास्थ्य या आरोग्य की निम्नलिखित परिभाषा की—
दैहिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना अर्थात (समस्या-विहीन होना)
स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों की अनुपस्थिति का ही नाम नहीं है। हमें सर्वांगीण स्वास्थ्य के बारे में अवश्य जानकारी होनी चाहिए। स्वास्थ्य का अर्थ विभिन्न लोगों के लिए अलग-अलग हो सकता है। लेकिन अगर हम एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण की बात करें तो अपने आपको स्वस्थ कहने का यह अर्थ होता है कि हम अपने जीवन में आनेवाली सभी सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियों का प्रबंधन करने में सफलतापूर्वक सक्षम हो, वैसे तो अपने आपको स्वस्थ रखने के ढेर सारी आधुनिक तकनीक मौजूद है लेकिन ये सारे उतने अधिक कारगर नहीं है।
समग्र स्वास्थ्य की परिभाषा
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, स्वास्थ्य सिर्फ रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति ही नहीं बल्कि एक पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक खुशहाली की स्थिति है। स्वस्थ लोग रोजमर्रा की गतिविधियों से निपटने के लिए और किसी भी परिवेश के मुताबिक अपना अनुकूलन करने में सक्षम होते हैं। रोग की अनुपस्थिति एक वांछनीय स्थिति है लेकिन यह स्वास्थ्य को पूर्णतया परिभाषित नहीं करता है। यह स्वास्थ्य के लिए एक कसौटी नहीं है और इसे अकेले स्वास्थ्य निर्माण के लिए पर्याप्त भी नहीं माना जा सकता है। लेकिन स्वस्थ होने का वास्तविक अर्थ अपने आप पर ध्यान केंद्रित करते हुए जीवन जीने के स्वस्थ तरीकों को अपनाया जाना है।
यदि हम एक अभिन्न व्यक्तित्व की इच्छा रखते हैं तो हमें हमेशा खुश रहना चाहिए और मन में इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि स्वास्थ्य के आयाम अलग— अलग टुकड़ों की तरह है। अतः अगर हम वास्तव में अपने जीवन को कोई अर्थ प्रदान करना चाहते हैं तो हमें स्वास्थ्य के इन विभिन्न आयामों को एक साथ फिट करना पड़ेगा। वास्तव में, अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना समग्र स्वास्थ्य का नाम है, जिसमें शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, बौद्धिक स्वास्थ्य, आध्यात्मिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्वास्थ्य भी शामिल है।
शारीरिक स्वास्थ्य
शारीरिक स्वास्थ्य व्यक्ति की शरीर की स्थिति को दर्शाता है जिसमें इसकी संरचना, विकास, कार्यप्रणाली और रखरखाव शामिल होता है। यह एक व्यक्ति की सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक सामान्य स्थिति है। यह एक जीव के कार्यात्मक और/या चयापचय क्षमता का एक स्तर भी है। अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के निम्नलिखित कुछ तरीके हैं-
1 संतुलित आहार की आदतें, मीठी श्वास व गहरी नींद
2 बड़ी आंत की नियमित गतिविधि व संतुलित शारीरिक गतिविधियां
3 नाड़ी स्पंदन, रक्तदाब, शरीर का भार व व्यायाम सहनशीलता आदि सब कुछ व्यक्ति के आकार, आयु व लिंग के लिए सामान्य मानकों के अनुसार होना चाहिए।
4 शरीर के सभी अंग सामान्य आकार के हों तथा उचित रूप से कार्य कर रहे हों।
मानसिक स्वास्थ्य
मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ हमारे भावनात्मक और आध्यात्मिक लचीलेपन से है जो हमें अपने जीवन में दर्द, निराशा और उदासी की स्थितियों में जीवित रहने के लिए सक्षम बनाती है। मानसिक स्वास्थ्य हमारी भावनाओं को व्यक्त करने और जीवन की ढ़ेर सारी माँगों के प्रति अनुकूलन की क्षमता है। इसे अच्छा बनाए रखने के निम्नलिखित कुछ तरीके हैं-
1 प्रसन्नता, शांति व व्यवहार में प्रफुल्लता
2 आत्म-संतुष्टि (आत्म-भर्त्सना या आत्म-दया की स्थिति न हो।)
3 भीतर ही भीतर कोई भावात्मक संघर्ष न हो (सदैव स्वयं से युद्धरत होने का भाव न हो।)
4 मन की संतुलित अवस्था।
बौद्धिक स्वास्थ्य
यह किसी के भी जीवन को बढ़ाने के लिए कौशल और ज्ञान को विकसित करने के लिए संज्ञानात्मक क्षमता है। हमारी बौद्धिक क्षमता हमारी रचनात्मकता को प्रोत्साहित और हमारे निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करने में मदद करता है।
1 समायोजन करने वाली बुद्धि, आलोचना को स्वीकार कर सके व आसानी से व्यथित न हो।
2 दूसरों की भावात्मक आवश्यकताओं की समझ, सभी प्रकार के व्यवहारों में शिष्ट रहना व दूसरों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना, नए विचारों के लिए खुलापन, उच्च भावात्मक बुद्धि।
3 आत्म-संयम, भय, क्रोध, मोह, जलन, अपराधबोध या चिंता के वश में न हो। लोभ के वश में न हो तथा समस्याओं का सामना करने व उनका बौद्धिक समाधान तलाशने में निपुण हो।
आध्यात्मिक स्वास्थ्य
हमारा अच्छा स्वास्थ्य आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ हुए बिना अधूरा है। जीवन के अर्थ और उद्देश्य की तलाश करना हमें आध्यात्मिक बनाता है। आध्यात्मिक स्वास्थ्य हमारे निजी मान्यताओं और मूल्यों को दर्शाता है। अच्छे आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने का कोई निर्धारित तरीका नहीं है। यह हमारे अस्तित्व की समझ के बारे में अपने अंदर गहराई से देखने का एक तरीका है।
1 समुचित ज्ञान की प्राप्ति तथा स्वयं को एक आत्मा के रूप में जानने का निरंतर बोध। सुप्रीम डॉक्टर के निरंतर संपर्क में रहना। स्वयं को जानने व अनुभव करने वाली आत्मा सदैव शांत व पवित्र होगी।
2 अपने शरीर सहित इस भौतिक जगत की किसी भी वस्तु से मोह न रखना। दूसरी आत्माओं के प्रभाव में आए बिना उनसे भाईचारे का नाता रखना। इस प्रकार एक व्यक्ति के कर्म उन्नत होंगे तथा उच्चस्तरीय व विशिष्ट हो पाएंगे।
3 सुप्रीम डॉक्टर या सर्वोच्च आत्मा से निरंतर बौद्धिक संप्रेषण ताकि सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त कर विशुद्ध कर्म की ओर प्रेषित की जा सके। आत्मा स्वयं को तथा दूसरों को विनीत, अनश्वर तथा दुर्गुणरहित पाएगी। उसे कोई भी सांसारिक बाधा त्रस्त नहीं कर सकती।
सामाजिक स्वास्थ्य
चूँकि हम सामाजिक जीव हैं अतः संतोषजनक रिश्ते का निमार्ण करना और उसे बनाए रखना हमें स्वाभाविक रूप से आता है। सामाजिक रूप से सबके द्वारा स्वीकार किया जाना हमारे भावनात्मक खुशहाली के लिए अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
(1) ऐसी मित्रता करें जो संतोषप्रद व दीर्घकालिक हो।
(2) परिवार व समाज से जुड़े संबंधों को हार्दिक व अक्षुण्ण बनाए रखें
(3) अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार समाज के कल्याण के लिए कार्य करना।
अधिकांश लोग अच्छे स्वास्थ्य के महत्त्व को नहीं समझते हैं और अगर समझते भी हैं तो वे अभी तक इसकी उपेक्षा कर रहे हैं। हम जब भी स्वास्थ्य की बात करते हैं तो हमारा ध्यान शारीरिक स्वास्थ्य तक ही सीमित रहता है। हम बाकी आयामों के बारे में नहीं सोचते हैं। अच्छे स्वास्थ्य की आवश्यकता हम सबको है। यह किसी एक विशेष धर्म, जाति, संप्रदाय या लिंग तक सीमित नहीं है। अतः हमें इस आवश्यक वस्तु के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। अधिकांश रोगों का मूल हमारे मन में होता है। एक व्यक्ति को स्वस्थ तब कहा जाता है जब उसका शरीर स्वस्थ और मन साफ और शांत हो। कुछ लोगों के पास भौतिक साधनों की कमी नहीं होती है फिर भी वे दुःखी या मनोवैज्ञानिक स्तर पर उत्तेजित हो सकते।
आयुर्वेद मे स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा इस प्रकार बताई है-
समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियाः ।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थः इत्यभिधीयते ॥
( जिस व्यक्ति के दोष (वात, कफ और पित्त) समान हों, अग्नि सम हो, सात धातुयें भी सम हों, तथा मल भी सम हो, शरीर की सभी क्रियायें समान क्रिया करें, इसके अलावा मन, सभी इंद्रियाँ तथा आत्मा प्रसन्न हो, वह मनुस्य स्वस्थ कहलाता है )। यहाँ 'सम' का अर्थ 'संतुलित' ( न बहुत अधिक न बहुत कम) है।
स्वास्थ्य की आयुर्वेद सम्मत अवधारणा बहुत व्यापक है। आयुर्वेद में स्वास्थ्य की अवस्था को प्रकृति (प्रकृति अथवा मानवीय गठन में प्राकृतिक सामंजस्य) और अस्वास्थ्य या रोग की अवस्था को विकृति (प्राकृतिक सामंजस्य से बिगाड़) कहा जाता है। चिकित्सक का कार्य रोगात्मक चक्र में हस्तक्षेप करके प्राकृतिक सन्तुलन को कायम करना और उचित आहार और औषधि की सहायता से स्वास्थ्य प्रक्रिया को दुबारा शुरू करना है। औषधि का कार्य खोए हुए सन्तुलन को फिर से प्राप्त करने के लिए प्रकृति की सहायता करना है। आयुर्वेदिक मनीषियों के अनुसार उपचार स्वयं प्रकृति से प्रभावित होता है, चिकित्सक और औषधि इस प्रक्रिया में सहायता-भर करते हैं।
स्वास्थ्य के नियम आधारभूत ब्रह्मांडीय एकता पर निर्भर है। ब्रह्मांड एक सक्रिय इकाई है, जहाँ प्रत्येक वस्तु निरन्तर परिवर्तित होती रहती है, कुछ भी अकारण और अकस्मात् नहीं होता और प्रत्येक कार्य का प्रयोजन और उद्देश्य हुआ करता है। स्वास्थ्य को व्यक्ति के स्वयं और उसके परिवेश से तालमेल के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। विकृति या रोग होने का कारण व्यक्ति के स्वयं का ब्रह्मांड के नियमों से ताल-मेल न होना है।
आयुर्वेद का कर्तव्य है, देह का प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखना और शेष विश्व से उसका ताल-मेल बनाना। रोग की अवस्था में, इसका कर्तव्य उपतन्त्रों के विकास को रोकने के लिए शीघ्र हस्तक्षेप करना और देह के सन्तुलन को पुन: संचित करना है। प्रारम्भिक अवस्था में रोग सम्बन्धी तत्त्व अस्थायी होते हैं और साधारण अभ्यास से प्राकृतिक सन्तुलन को फिर से कायम किया जा सकता है।
यह सम्भव है कि आप स्वयं को स्वस्थ समझते हों, क्योंकि आपका शारीरिक रचनातन्त्र ठीक ढंग से कार्य करता है, फिर भी आप विकृति की अवस्था में हो सकते हैं अगर आप असन्तुष्ट हों, शीघ्र क्रोधित हो जाते हों, चिड़चिड़ापन या बेचैनी महसूस करते हों, गहरी नींद न ले पाते हों, आसानी से फारिग न हो पाते हों, उबासियाँ बहुत आती हों, या लगातार हिचकियाँ आती हो, इत्यादि।
स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में पंच महाभूत, आयु, बल एवं प्रकृति के अनुसार योग्य मात्रा में रहते हैं। इससे पाचन क्रिया ठीक प्रकार से कार्य करती है। आहार का पाचन होता है और रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सातों धातुओं का निर्माण ठीक प्रकार से होता है। इससे मल, मूत्र और स्वेद का निर्हरण भी ठीक प्रकार से होता है।
स्वास्थ्य की रक्षा करने के उपाय बताते हुए आयुर्वेद कहता है-
त्रय उपस्तम्भा: आहार: स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति (चरक संहिता सूत्र. 11/35)
अर्थात् शरीर और स्वास्थ्य को स्थिर, सुदृढ़ और उत्तम बनाये रखने के लिए आहार, स्वप्न (निद्रा) और ब्रह्मचर्य - ये तीन उपस्तम्भ हैं। ‘उप’ यानी सहायक और ‘स्तम्भ’ यानी खम्भा। इन तीनों उप स्तम्भों का यथा विधि सेवन करने से ही शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा होती है।
इसी के साथ शरीर को बीमार करने वाले कारणों की भी चर्चा की गई है यथा-
धी धृति स्मृति विभ्रष्ट: कर्मयत् कुरुतशुभम्।
प्रज्ञापराधं तं विद्यातं सर्वदोष प्रकोपणम्॥ -- (चरक संहिता; शरीर. 1/102)
अर्थात् धी (बुद्धि), धृति (धारण करने की क्रिया, गुण या शक्ति/धैर्य) और स्मृति (स्मरण शक्ति) के भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य जब अशुभ कर्म करता है तब सभी शारीरिक और मानसिक दोष प्रकुपित हो जाते हैं। इन अशुभ कर्मों को प्रज्ञापराध कहा जाता है। जो प्रज्ञापराध करेगा उसके शरीर और स्वास्थ्य की हानि होगी और वह रोगग्रस्त हो ही जाएगा।
स्वास्थ्य का आधुनिक दृष्टिकोण
स्वास्थ्य की देखभाल का आधुनिक दृष्टिकोण आयुर्वेद के समग्र दृष्टिकोण के विपरीत है, अलग-अलग नियमों पर आधारित है और पूरी तरह से विभाजित है। इसमें मानव-शरीर की तुलना एक ऐसी मशीन के रूप में की गई है, जिसके अलग-अलग भागों का विश्लेषण किया जा सकता है। रोग को शरीर रूपी मशीन के किसी पुरजे में खराबी के तौर पर देखा जाता है। देह की विभिन्न प्रक्रियाओं को जैविकीय और आणविक स्तरों पर समझा जाता है और उपचार के लिए, देह और मानस को दो अलग-अलग सत्ता के रूप में देखा जाता है।
                                                                                                        वैद्य एस0के0यादव

Friday, April 10, 2015

शूकर इन्फ्लूएंजा

शूकर इन्फ्लूएंजा, जिसे एच1एन1 या स्वाइन फ्लू भी कहते हैं, विभिन्न शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणुओं मे से किसी एक के द्वारा फैलाया गया संक्रमण है। शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणु (SIV-एस.आई.वी), इन्फ्लूएंजा कुल के विषाणुओं का वह कोई भी उपभेद है, जो कि सूअरों की स्थानिकमारी के लिए उत्तरदायी है। 2009 तक ज्ञात एस.आई.वी उपभेदों में इन्फ्लूएंजा सी और इन्फ्लूएंजा ए के उपप्रकार एच1एन1 (H1N1), एच1एन2 (H1N2), एच3एन1 (H3N1), एच3एन2 (H3N2) और एच2एन3 (H2N3) शामिल हैं। इस प्रकार का इन्फ्लूएंजा मनुष्यों और पक्षियों पर भी प्रभाव डालता है। शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणु का दुनिया भर के सुअरो मे पाया जाना आम है। इस विषाणु का सूअरों से मनुष्य मे संचरण आम नहीं है और हमेशा ही यह विषाणु मानव इन्फ्लूएंजा का कारण नहीं बनता, अक्सर रक्त में इसके विरुद्ध सिर्फ प्रतिपिंडों (एंटीबॉडी) का उत्पादन ही होता है। यदि इसका संचरण, मानव इन्फ्लूएंजा का कारण बनता है, तब इसे ज़ूनोटिक शूकर इन्फ्लूएंजा कहा जाता है। जो व्यक्ति नियमित रूप से सूअरों के सम्पर्क में रहते है उन्हें इस फ्लू के संक्रमण का जोखिम अधिक होता है। यदि एक संक्रमित सुअर का मांस ठीक से पकाया जाये तो इसके सेवन से संक्रमण का कोई खतरा नहीं होता। २०वीं शताब्दी के मध्य मे, इन्फ्लूएंजा के उपप्रकारों की पहचान संभव हो गयी जिसके कारण, मानव मे इसके संचरण का सही निदान संभव हो पाया। तब से ऐसे केवल 50 संचरणों की पुष्टि की गई है। शूकर इन्फ्लूएंजा के यह उपभेद बिरले ही एक मानव से दूसरे मानव मे संचारित होते हैं। मानव में ज़ूनोटिक शूकर इन्फ्लूएंजा के लक्षण आम इन्फ्लूएंजा के लक्षणों के समान ही होते हैं, जैसे ठंड लगना, बुखार, गले में ख़राश, खाँसी, मांसपेशियों में दर्द, तेज सिर दर्द, कमजोरी और सामान्य बेचैनी। चिन्ह व लक्षण सूअर में— शूकरों में शूकर इंफ्लूएंजा के मुख्य लक्षण— सूअरों में इन्फ्लूएंजा संक्रमण के कारण ज्वर, सुस्ती, छींक, खाँसी, साँस लेने में कठिनाई और भूख की कमी हो सकती है। कुछ मामलों में यह संक्रमण गर्भपात का कारण बन सकता है। हालांकि आमतौर पर मृत्यु सिर्फ 1-4% मामलों मे ही होती है। यह संक्रमण सूअर का वजन घटा और विकास को प्रभावित कर सकता है जो इनके पालको के आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है। संक्रमित सूअर का वजन 3 से 4 सप्ताह की अवधि के दौरान 5 से 6 किलोग्राम तक घट सकता है। मनुष्यों में शूकर इन्फ्लूएंजा का मुख्य लक्षण हैं: - ज्वर गले मे खरांश जुकाम खाँसी सिर व बदन दर्द जोड़ों में कठोरता उल्टी मूर्छा ठंड लगना कुछ मामलों में शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणु का संचरण, सूअरों से सीधे मनुष्यों मे होना संभव है, इस स्थिति मे इसे ज़ूनोटिक शूकर इन्फ्लूएंजा कहा जाता है। 1958 से लेकर अभी तक ऐसे सिर्फ 50 मामले ही रिपोर्ट हुये हैं, जिनमे से भी सिर्फ 6 व्यक्ति ही मृत्यु का ग्रास बने हैं। इन छह लोगों में से एक गर्भवती महिला थी, एक को ल्यूकिमिया था, एक हॉजकिन रोग का शिकार था और दो लोग पहले से स्वस्थ थे। भले ही यह प्रत्यक्ष मामले बहुत कम लगे पर वास्तविक संक्रमण की सही दर इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि ज्यादातर मामलों मे यह सामान्य रोग ही प्रतीत होता है और इस कारण इसे रिपोर्ट ही नहीं किया जाता। वर्गीकरण मानव इन्फ्लूएंजा के लिए उत्तरदायी, तीन वंशो के इन्फ्लूएंजा विषाणुओं मे से दो, सूअरों में भी इन्फ्लूएंजा फैला सकते हैं, जिसमे से इन्फ्लूएंजा ए तो बहुत आम है पर इन्फ्लूएंजा सी यदा कदा ही पाया जाता है। अभी तक इन्फ्लूएंजा बी को सूअरों में नहीं देखा गया है। इन्फ्लूएंजा ए और इन्फ्लूएंजा सी के भीतर मनुष्य और सूअरों में पाये जाने वाले उपभेद भिन्न होते हैं हालांकि पुन:पृथक्करण (रीअसोर्टमेंट) के कारण उपभेदों मे बड़े पैमाने जीन का स्थानांतरण देखा गया है चाहें यह सूअर, पक्षी या मानव प्रजाति में उपस्थित हो। इन्फ्लूएंजा सी इन्फ्लूएंजा सी विषाणु, मानव और सूअरों दोनों को संक्रमित करता है लेकिन इसका संक्रमण पक्षियों मे नहीं होता। अतीत मे भी इसका संचरण सूअरों और इंसानों के बीच हुआ है। उदाहरण के लिए, इन्फ्लूएंजा सी के कारण जापान और कैलिफोर्निया में बच्चों के बीच इन्फ्लूएंजा का कम प्रभावी प्रकार फैला था। अपनी सीमित परपोषी रेंज और आनुवंशिक विविधता की कमी के कारण इन्फ्लूएंजा सी मानव में महामारी का कारण नहीं बन पाया है। इन्फ्लूएंजा ए शूकर इन्फ्लूएंजा, इन्फ्लूएंजा ए के उपप्रकार एच1एन1,एच1एन2,एच3एन1,एच3एन2,और एच2एन3.के कारण होता है। पूरे विश्व मे सूअरों में, तीन इन्फ्लूएंजा ए विषाणु उपप्रकार एच1एन1, एच3एन2 और एच1एन2 सबसे आम हैं। पृष्ठभूमि एच१एन१ स्पैनिश फ्लु से आया, जो 1918 और 1919 के दौरान फैली एक महामारी थी जिससे लगभग 5 करोड़ लोग मारे गए थे। जो वायरस स्पैनिश फ्लु से आया वह सूअरों में विद्यमान रहा। इसका संचलन 20 वीं सदी के दौरान मनुष्यों में भी हुआ, यद्यपि यह वर्ष के उस समय होता है जब प्रतिवर्ष होने वाली महामारियाँ फैलती हैं, जिससे 'सामान्य' इंफ्लुएंजा और शूकर इंफ्लुएंजा में अंतर कर पाना कठिन है। हालांकि सुअरों से मनुष्यों में होने वाले संक्रमण के मामले बहुत विरल हैं और 2005 के बाद से अमेरिका में 12 मामले पाए गए हैं। शूकर इंफ्लुएंजा कहाँ पाया जाता है मनुष्यों में शूकर इंफ्लुएंजा यह शूकर के द्वारा मनुष्यों में फैला। बचाव हर किसी को अपना मुँह और अपनी नाक ढक कर रखना जरूरी है, खासकर तब जब कोई छींक रहा हो। बार-बार हाथ धोना जरूरी है। अगर किसी को ऐसा लगता है कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है तो उन्हें घर पर रहना चाहिये। ऐसी स्थिति में काम या स्कूल पर जाना उचित नहीं होगा और जहां तक हो सके भीड़ से दूर रहना फायदेमंद साबित होगा। अगर सांस लेने में तकलीफ होती है, या फिर अचानक चक्कर आने लगते हैं, या उल्टी होने लगती है तो ऐसे हालात में फ़ौरन डॉक्टर के पास जाना जरूरी है। खराब पानी से दूर रहे यदि किसी को यह बीमारी है, तो उससे कम से कम 1 मीटर की दूरी बनाकर रहें। यह बीमारी ठंड में अधिक फैलता है। दिन और रात का तापमान यदि 25॰C से ऊपर हो तो इसके विषाणु मर जाते हैं। वैद्य एस0के0यादव

Wednesday, December 10, 2014

लड़कियों की 'पसंद' ओरल सेक्स

नेशनल हेल्थ स्टैटिक सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार ‍ओरल सेक्स करने की प्रवृति टीनएजर्स में कम हो रही है, जबकि युवाओं में अब भी ओरल सेक्स का क्रेज़ बना हुआ है। अमेरिका में हाल ही में जारी हुई नेशनल हेल्थ स्टैटिक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले आंकड़ों की तुलना में टीनएजर्स में ओरल सेक्स करने प्रवृति में कमी आई है, लेकिन यंगस्टर्स में ओरल सेक्स करने की आदत आंशिक रूप से बढ़ी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़कों की तुलना में लड़कियां पहली बार सेक्स करने के दौरान ओरल सेक्स को प्राथमिकता देती हैं, क्योंकि वे प्रेग्नेंसी और अन्य यौन बीमारियों जैसे कॉन्ट्रेक्टिंग सेक्सुअल ट्रांसमिटेड डिसीज़ से बचना चाहती हैं। यौन बीमारियों और प्रेग्नेंसी से बचने के लिए लड़कियां मुख मैथुन करना पसंद करती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 से 24 वर्ष की आयु के बीच के दो तिहाई युवाओं ने आवश्यक रूप से ओरल सेक्स किया। लड़कियों ने खास तौर पर पहली बारी योनि संभोग से पहले कई बार ओरल सेक्स किया। सर्वे के अनुसार 26 प्रतिशत लड़कियों ने योनि संभोग से पहले ओरल सेक्स किया, जबकि 27 प्रतिशत लड़कियों ने एक बार योनि संभोग के बाद ओरल सेक्स का आनंद लिया । 7.4 प्रतिशत लड़कियां ऐसी भी रहीं, जिन्होने योनि संभोग और ओरल सेक्स का मज़ा एक साथ किया।
पेरेंटहूड फेडरेरेशन ऑफ अमेरिका की वाइस प्रेसिडेंट लेज़ली केंटर ने इस बारे में युवाओं के स्वास्थ्य पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ओरल सेक्स टीएएजर्स के लिए हौवा है। उन्हें यह जान लेना चाहिए कि यह पूरी तरह बीमारी मुक्त नहीं है। सर्वे में ओरल सेक्स से होने वाले संभावित खतरों पर चिंता भी जताई गई है। (एजेंसियां)

पश्चिम में न्यूड योगा की धूम

भारत वर्ष में ऋषि मुनियों ने हमेशा योग पर जोर दिया है। आज योग न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी प्रचलित हो रहा है,वैसे हमें इस बात पर गर्व हो सकता है कि भारत से शुरू हुई योग यात्रा विदेशों में भी चलन में आ रही है। लेकिन आपको ये जानकर बिल्कुल भी खुशी नहीं होगी की भारत का योग विदेशों में पहुंचकर न सिर्फ योगा हो गया है बल्कि इसको करने का तरीका भी बदल गया है, जी हां विदेशों में योगा न्यूड होकर करने का चलन बढ़ रहा है। आज न्यूड योगा का चलन यहां व्यवसाय का रूप लेता जा रहा है,अब ऐसे योग सेंटर खोले जा रहे हैं जिनमें योगा न्यूड होकर किया जाता है। फिलहाल न्यूड योगा क्लास सिर्फ पुरुषों के लिए है। यहां कई सेंटर ऐसे हैं भी हैं जहां महिलाएं को सिर्फ अंडर गार्मेंट्स में ही योगा कराया जाता है । इन देशों में अमेरिका कनाडा, यूके, स्पेन, आस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं। योग के इस बदलते रूप को इस तरह भी देखा जा सकता है कि भारत की संस्कृति योगवादी रही है और पश्चिम की भोगवादी इसलिए पश्चिमी देशों ने इसे अपनी भोगवादी और खुली संस्कृति के अनुसार ढाल लिया। यहीं नहीं न्यूड योग का चलन हॉलीवुड की अभिनेत्रियों में देखा जा रहा है।
इन देशों में न्यूड होकर योगा करने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे योगा ज्यादा जल्दी असर दिखाता है और इससे सेक्स क्षमता भी बढ़ती है,वैसे भारत में योगा का प्रचार बाबा रामदेव कर रहे हैं, उन्होंने कहा भी है कि योगा के प्रचार के लिए ग्लैमर जरूरी है लेकिन इससे इतना ग्लैमर जुड़ जाएगा ये तो उन्होंने भी नहीं सोचा होगा।
न्यूयॉर्क के योग स्टूडियो में पुरुषों की न्‍यूड योगा क्‍लास की लोकप्रियता से संकेत लेते हुए, अब इसके आयोजक नग्न योग के सहशिक्षण की पेशकश कर रहे हैं। बोल्ड एंड नेकेड (साहसी और नग्न) योग के नाम से जाने जाने वाले इस योग की पुरुषों और महिलाओं की सहशिक्षण कक्षाओं की समय सारिणी पेश की जाएगी।
मालिकों का कहना कि है यह पेशकश योग प्रशिक्षण के दौरान आरामदेह महसूस करने के लिए है और इस अवस्था में योग करने से आश्‍चर्यजनक आत्मविश्‍वास आता है। अपनी साथी मोनिका वर्नर के साथ स्टूडियो चलाने वाले वो जोस्ची श्‍वार्ज ने कहा कि यह शरीर के प्रति आपके नकारात्मक एहसास से आपको मुक्त करता है और आप खुद को अधिक स्वीकार करने वाले बनते हैं और खुद से गहराई तक जुड़ते हैं। इनकी वेबसाइट पर कहा गया है कि यह खुद को जानने, स्वीकार करने और प्यार करने के लिए है, योग का हिस्सा अपने शरीर का सम्मान करना और उससे जुड़ना है। वर्नर ने बताया कि जब वस्‍त्रहीनता की अवस्था में आपमें ज्यादा आत्मविश्वास आता है, तब कपड़े पहनने के बाद भी आप में उतना ही आत्मविश्वास बना रहता है।
भारत में सदियों से शरीर को स्वस्थ रखने के लिए योग किया जाता रहा है। आज भी भारत में योग करने वालों की तादाद लाखों में है। आपने भी योग की सभी विधियों को देखा या किया होगा, पर क्या आपने कभी न्यूड योग के बारे में सुना है। अगर नहीं तो आपको यकीन करना होगा कि दुनिया में ऎसी जगह भी है जहां न्यूड योग होता है। और वो भी कंबाइंड में यानि कि पुरूष-महिला एक साथ योग करते हैं। अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में यह योग एक योगा क्लासेज स्टूडियो में होता है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि जब से योग ने भारत की सरहदें लाँघी है तब से यह मर्यादा की सरहदें भी लाँघ चुका है। अमेरिका में योग का योगा होते-होते अब योग और भोग का समन्वय होने लगा है अर्थात भोगवादी संस्कृति और योगवादी संस्कृति दोनों ही मिलकर विश्व में नया बाजार तलाश करने में जुट गई है। योग पर अब ग्लैमर के रंग के साथ ही सेक्स का रंग इसलिए चढ़ाया जाने लगा है कि योग के सारे आसन और प्राणायाम को एक प्रोडक्ट बनाकर बेचा जा सके। इसीके चलते न्यूड योगा, हॉट योगा और सेक्सी योगा आदि के नाम से जहाँ योगा क्लास संचालित हो रही है।
                                                                                                                         वैद्य एस0के0यादव

Saturday, December 6, 2014

आपका बच्चा जब पूछे ऐसा सवाल...



आपका बच्चा जब पूछे ऐसा सवाल...
बच्चे कई बार सेक्स संबंधित ऐसे सवाल पैरंट्स से पूछ बैठते हैं, जिनका जवाब देना उलझन भरा काम होता है। कई बार मां-बाप ऐसे सवालों को टाल जाते हैं तो कई बार बच्चों को डांट देते हैं। दोनों ही चीजें बच्चे के मानसिक विकास के लिए नुकसानदायक हैं। फिर क्या करें ? बच्चे के ऐसे हर सवाल का खास तरीके से जवाब दें। कैसे, एक्सपर्ट्स से मिली जानकारी के आधार पर हम आपको बता रहे हैं—
4-9 साल के बच्चों के सवाल 
बच्चे कहां से आते हैं ? मैं कहां से आया ? पड़ोस वाली आंटी का पेट बड़ा क्यों है ?( प्रेगनेंट महिला को देखकर)
यह एक ऐसा सवाल है, जो इस उम्र के लगभग हर बच्चे के दिमाग में उठता है। ऐसे सवाल पूछने पर बच्चे को डांटना या उसकी बात को आई-गई करना ठीक नहीं है, क्योंकि इस जिज्ञासा को अगर आपने शांत नहीं किया तो वह कहीं और से जानने की कोशिश करेगा और ऐसे में बहुत मुमकिन है कि वह भ्रमित हो जाए। इस उम्र के बच्चे कुदरत और जानवरों के उदाहरणों से किसी बात को अच्छी तरह समझ लेते हैं। ऐसे में इस सवाल का जवाब देने के लिए आप उसे कहीं गार्डन या बाहर वॉक पर ले जाएं। फूलों का उदाहरण देकर समझाएं कि कैसे वे पैदा होते हैं और फिर मां के शरीर से अलग होकर खुद अपनी बढ़ोतरी करते हैं। आप उसे सीधे-सीधे यह भी कह सकते हैं कि तुम्हारी मां के शरीर में एक खास अंग है , जिसे गर्भाशय कहते हैं। तुम वहीं से आए हो। इस उम्र में जन्म की पूरी प्रक्रिया के बारे में बताने की जरूरत नहीं है और न ही ऐसी कोई बात बच्चे को कहें कि वह भगवान के यहां से आया या उसे किसी साधु बाबा के यहां से लाए थे। उसे साफ-साफ बताएं कि वह मां के शरीर से पैदा हुआ है। प्रेग्नेंट महिला के बारे में भी बता सकते हैं कि इसी तरह उन आंटी के शरीर से भी एक बेबी पैदा होगा ।
अगर बच्चा पैरंट्स की शादी की ऐल्बम देखकर)कहे इसमें सबकी फोटो है,मेरी क्यों नहीं है ? तो इस सवाल को हैंडल करने के कई तरीके हो सकते हैं। 4-6 साल के बच्चों को असली बात समझा पाना मुश्किल है। इस सवाल का जवाब कुछ इस तरह दे सकते हैं कि तुम्हें तब तक मां-पापा इस दुनिया में लाए ही नहीं थे। भ्रमित करने वाले जवाब देने से बचना चाहिए।
लड़कियों और लड़कों के प्राइवेट पार्ट्स अलग-अलग क्यों होते हैं ? ( कई बार बच्चे एक-दूसरे के कपड़ों में झांकते हैं और उनकी जिज्ञासा बढ़ती है।)
इतनी छोटी उम्र में आप बच्चे को शरीर के अंगों की जानकारी नहीं दे सकते। इसलिए उसे समझाएं कि दुनिया में हर शख्स अलग होता है और अलग ही दिखाई देता है। ईश्वर ने हर शख्स को अलग-अलग बनाया है और इसीलिए उनके शरीर की बनावट भी अलग होती है। मसलन लड़कों के शरीर की बनावट अलग होती है और लड़कियों के शरीर की अलग। इसी तरह कुत्ता, बिल्ली, गाय, भैंस और भी तमाम जीव अपने आप में खास होते हैं। तुम लड़के हो और तुम्हारे अंग लड़कियों से अलग बनाए गए हैं।
 सैनिटरी नैपकिन के बारे में पूछना कि यह क्या है ? 
सैनिटरी नैपकिंस के बारे में पूछने पर बच्चों को बता सकते हैं कि ये नैपकिन हैं। जैसे नाक या हाथ पोंछने के लिए तुम सामान्य नैपकिन का इस्तेमाल करते हो , उसी तरह शरीर के प्राइवेट पार्ट्स को पोंछने और उन्हें साफ रखने के लिए मां इनका इस्तेमाल करती है। ये नैपकिन उन नैपकिन से थोड़े अलग होते हैं जिनका इस्तेमाल तुम करते हो, लेकिन इनका काम वही है। इस उम्र में इससे ज्यादा बच्चे को बताने की जरूरत नहीं है।
कॉन्डोम क्या होता है ? ( टीवी आदि में ऐड देखकर)
कॉन्डोम के बारे में बच्चे की जिज्ञासा बेहद नॉर्मल है। अगर घर में कॉन्डोम को छिपाकर भी रखा जाए तो भी इस बात की पूरी संभावना है कि बच्चे टीवी ऐड या सड़कों पर लगे विज्ञापनों के जरिए इस शब्द से परिचित हो चुके हों और इस बारे में आपसे जानने की कोशिश करें। इतने छोटे बच्चों को बता सकते हैं कि जैसे हाथों को किसी बीमारी से बचाने के लिए हम ग्लव्स पहन लेते हैं, उसी तरह कॉन्डम भी एक ग्लव्स की तरह होता है, जो पुरुषों को बीमारियों से बचाता है। अगर बच्चा 14-15 साल के आसपास है तो उसे यह भी कह सकते हैं कि कॉन्डम सेक्स के दौरान पुरुषों को बीमारी से बचाने और बेबी होने से रोकने के काम आता है। सेक्स शब्द का प्रयोग करने से घबराएं नहीं, क्योंकि बच्चे को शिक्षा देने के लिए एक-न-एक दिन इस शब्द का इस्तेमाल करना ही है।
9-14 साल के बच्चों के सवाल
मेरे शरीर में ये अचानक बदलाव क्यों आ रहे हैं ? मसलन दाढ़ी मूंछ आना , प्राइवेट पार्ट्स पर बाल, मुहांसों की शुरुआत आदि।
14-15 साल की उम्र किसी बच्चे को यौवन के बारे में जानकारी देने का सही समय है। बच्चों को सबसे पहले इस बात का एहसास दिलाया जाए कि उनके शरीर में जो भी बदलाव आ रहे हैं, वे बिल्कुल नॉर्मल हैं और जरूरी भी। उन्हें बताएं कि तुम्हारे शरीर के विभिन्न अंगों पर आने वाले बाल, आवाज में आने वाला बदलाव, मुंहासे निकलना आदि सभी कुछ नॉर्मल है और ऐसा हॉर्मोनल बदलाव की वजह से हो रहा है। ऐसा सभी के साथ होता है। हमारे साथ भी ऐसा हुआ था। लड़कियों और लड़कों दोनों में ही ऐसे बदलाव आते हैं, हालांकि कुछ चीजें लड़कों और लड़कियों दोनों में अलग-अलग हो सकती हैं।
पीरियड्स क्या होते हैं ?
यह जानना जरूरी है कि लड़कियों को पीरियड्स की जानकारी उस समय ही दे दी जानी चाहिए, जब उनके पीरियड्स शुरू नहीं हुए हों और होने वाले हों। यह ऐसा सवाल है, जिसका जवाब मां को बेटी के पूछने से पहले ही दे देना है। ऐसी अवस्था कौन-सी होगी, इसका फैसला मां से बेहतर कोई नहीं कर सकता, फिर भी आमतौर पर 14 साल की उम्र यह सब जानकारी देने के लिए ठीक है। इस बारे में जानकारी देने का काम मां खुद करे । उन्हें बताया जा सकता है कि यह नॉर्मल है और सभी लड़कियों के साथ ऐसा होता है। बेटियों के साथ मां अपना पर्सनल अनुभव भी शेयर कर सकती हैं और उन्हें सभी बातें विस्तार से बता सकती हैं। मां उन्हें बता सकती हैं कि उनके साथ भी जब ऐसा हुआ था, तो उन्हें भी अजीब-सा लगा था और दर्द भी हुआ लेकिन बाद में यह बिल्कुल नॉर्मल चीज बन गई।
बच्चा कैसे पैदा होता है ?  
इस उम्र तक आते-आते बच्चे की समझ इतनी विकसित हो जाती है कि वह बच्चा पैदा होने के बारे में थोड़ा-बहुत समझ ले। उसे बता सकते हैं कि बच्चा मां के पेट में होता है। जब बच्चा पैदा होने वाला होता है तो मां के पेट के अंत में मौजूद सर्विक्स फैलने लगती है। वहां की मांसपेशियां बच्चे को बाहर धकेलने लगती हैं और बच्चा मां के प्राइवेट पार्ट के जरिए बाहर आ जाता है।
बाल यौन शोषण(चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज)
बच्चों का यौन शोषण करने वाले लोग दिखने में सामान्य ही होते हैं, लेकिन देखा गया है कि ऐसे लोग बच्चों के साथ जरूरत से ज्यादा वक्त बिताते हैं और उनके साथ ज्यादा घुलने-मिलने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों को पकड़ना या उनकी पहचान कर पाना आसान नहीं है। कई बार ऐसे लोग आपके बेहद नजदीकी भी हो सकते हैं, जिन पर आप शक भी नहीं कर पाएंगे। ऐसे में बेहतर यही है कि बच्चे को बाल यौन शोषण के बारे में परिचित कराएं और उसे साफ-साफ बताएं कि अगर कोई भी उसके साथ ऐसी हरकत करता है तो वह फौरन आपको बताए।
ऐसे समझाएं बच्चे को 
यौन शोषण से बच्चे खुद को बचा सकें, इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि उन्हें पूरी सेक्स एजुकेशन ही दी जाए। देखिए, एक जागरूक और समझदार मां अपनी  बेटी को कैसे बता सकती है इस सबके बारे में। आप भी यह तरीका अपना सकते हैं:—
- बेटा, टच तीन तरह के होते हैं। गुड टच, बैड टच और सीक्रेट टच।
- गुड टच वह टच होता है, जिससे तुम्हें खुशी मिलती है। जैसे कोई तुम्हें गले से लगा ले, तुमसे हाथ मिला ले, तुम्हारी पीठ थपथपा दे या हाई फाइव करे।
- दूसरी तरफ बैड टच तुम्हें परेशान करता है। इससे तुम्हें बुरा लगता है। मसलन कोई तुम्हें नोच ले, चिकोटी काट ले या किक मार दे।
- अब बात सीक्रेट टच की। सीक्रेट टच के दो हिस्से होते हैं। पहला हिस्सा यह है कि यह टच तुम्हारे प्राइवेट पार्ट्स पर किया जाता है यानी शरीर के उन हिस्सों पर जो स्विम सूट पहनने के दौरान कवर हो जाते हैं। मोटे तौर पर ये तीन अंग हैं। सीना, बॉटम और आगे का हिस्सा। याद रखो ये प्राइवेट हिस्से हैं और इन्हें देखने और टच करने का अधिकार किसी को नहीं है। सीक्रेट टच का दूसरा हिस्सा यह होता है कि ऐसा टच करने वाला व्यक्ति तुम्हें यह कहेगा कि इस बात को किसी को मत बताना। हो सकता है, वह तुम्हें डराए और धमकाए कि यह बात किसी को नहीं बतानी है। यहां यह जानना जरूरी है कि नहलाते वक्त मां ऐसा कर सकती है। वह सीक्रेट टच नहीं है क्योंकि वह कभी नहीं कहती कि यह बात किसी को बताना मत। इसी तरह डॉक्टर अगर तुम्हें इन जगहों पर टच करते हैं, तो वह भी सीक्रेट टच नहीं है क्योंकि डॉक्टर भी यह कभी नहीं कहते कि यह किसी से कहना मत। हालांकि डॉक्टर तुम्हारे इन अंगों को चेक तभी कर सकते हैं, जब तुम्हारे मां या पापा में से कोई साथ हो। लेकिन अगर कोई शख्स तुम्हें ऐसी जगहों पर टच करे और तुम्हें धमकाए या कहे कि यह बात किसी को मत बताना तो यह बात तुम्हें फौरन अपने मम्मी या पापा को जरूर बतानी है।
एक्सपर्ट्स से पूछें 
हर बच्चा अपने आप में यूनीक है और हर बच्चे के मन में उठने वाले सवालों का स्तर भी। हमने कई आम सवालों को छूने की कोशिश की है, फिर भी अगर आपका बच्चा कोई ऐसा सवाल पूछता है जिसका यहां जिक्र होने से रह गया है, तो आप हमें अपना सवाल हिंदी या अंग्रेजी में लिख सकते हैं। मेल करें: socialsamvad@gmail.com पर। हमारे एक्सपर्ट आपको बताएंगे कि उस सवाल का सही जवाब बच्चे को कैसे दिया जाए।
कुछ उलझन भरी स्थितियां 
- अगर बच्चा पैरंट्स को लवमेकिंग करते देख ले। 
अगर बच्चा पैरंट्स को प्राइवेट पलों में देख ले, तो उसके मन पर इसका गहरा असर हो सकता है। ऐसे में उसे हर बात समझाना जरूरी है। अगर पैरंट्स ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि बच्चे के सामने आ सकें और बच्चा अचानक कमरे में आ जाता है, तो हड़बड़ाएं नहीं। उसे आराम से कह दें, बेटा अभी मां-पापा को प्राइवेट टाइम चाहिए। अभी अपने कमरे में चले जाओ, तो कुछ ही मिनट में हम आपसे बात करेंगे। बाद में बच्चे को समझाएं कि मां-पापा एक-दूसरे को प्यार कर रहे थे। ऐसा करते वक्त हम दरवाजा बंद कर लेते हैं क्योंकि यह सब प्राइवेट होता है, लेकिन आज हम दरवाजा बंद करना भूल गए। अब बच्चे के रिएक्शन देखें। अगर बच्चा अभी भी परेशान है तो उसे समझाएं कि न तो उसने ऐसे अचानक आकर कोई गलती की है और न ही मां-पापा कोई गलत काम कर रहे थे। यह सब नॉर्मल है। कोशिश करें कि बच्चे के मन में कहीं भी यह भाव न पनपने पाए कि पापा मां को परेशान कर रहे थे।
- अगर टीवी देखते हुए कोई लवमेकिंग या किसिंग सीन आ जाता है। 
टीवी देखते वक्त अगर अचानक किसिंग या लवमेकिंग सीन आ जाए तो हड़बड़ाएं नहीं और न ही टीवी बंद करने या चैनल बदलने की कोशिश करें। सहज भाव से उसे वैसे ही चलने दें और जब सीन खत्म हो जाए तो बच्चे को देखें। अगर वह असहज है या खुद ही उसके बारे में पूछ बैठता है तो इसे शिक्षा देने का एक मौका समझें। बच्चे को उसकी उम्र के मुताबिक, इस बारे में समझा सकते हैं। मसलन ये लोग आपस में प्यार कर रहे थे या यह दो बड़े लोगों के बीच प्यार करने का एक तरीका होता है। अगर आप असहज हो गए या चैनल बदला तो बच्चे पर गलत असर हो सकता है, लेकिन उसे सही सूचना देने से उस पर गलत असर कभी नहीं होगा।
- अगर बच्चा बड़ों को कपड़े बदलते या नहाते चुपचाप देखने की कोशिश करता है। 
जिज्ञासा के चलते बच्चे छुपकर बड़ों को कपड़े बदलते या नहाते देखने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसा होना नॉर्मल है। ऐसे में, उन्हें समझाएं कि यह गलत बात हैं। किसी को भी छिपकर नहीं देखना चाहिए। उनसे कहें- तुम्हें भी यह अच्छा नहीं लगेगा कि तुम्हें कोई छिपकर देखे। इसलिए तुम्हें भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए। भूलकर भी बच्चे को डांटें नहीं। उसे यह एहसास न होने दें कि उसने कोई गलत काम कर दिया है। अगर बच्चे को थोड़ी समझ है तो इस मौके पर उसे पुरुष और स्त्री के अंगों के बारे में भी थोड़ी जानकारी दी जा सकती है।
समझाते वक्त पैरंट्स रखें ध्यान
- बच्चे को सेक्स से संबंधित ज्ञान देने की कोई उम्र नहीं होती। यह हर बच्चे के स्तर पर निर्भर करता है। वैसे बच्चे की सेक्स एजुकेशन तभी शुरू हो जाती है , जब वह पालने में होता है।
- बच्चे जब भी सेक्स से संबंधित कोई सवाल पूछें तो उसे एक ऐसे मौके के तौर पर देखना चाहिए, जब आप बच्चे की सेक्स एजुकेशन की शुरुआत कर सकते हैं।
- बच्चे जब भी इस तरह के सवाल पूछें, तो कोशिश यह होनी चाहिए कि उनके इन सवालों के जवाब एकांत में दिए जाएं। अगर बच्चा किसी के सामने सवाल पूछ बैठता है तो उसे प्यार से कह दें कि इसके बारे में हम तुम्हें बाद में बताएंगे और फिर इस वादे को पूरा करें।
- किसी भी सवाल का जवाब इस अंदाज में न दिया जाए, जो बालक की भावनाओं को भड़काए या उत्तेजित करे।
- बच्चे के साथ सख्त और गैर-दोस्ताना रवैया न रखें। आप जो भी बता रहे हैं , वह उसके विकासकाल के मुताबिक होना चाहिए। वैसे ज्यादा ज्ञान भी दे देंगे तो उसका कोई नुकसान नहीं होगा। ज्ञान कभी हानिकारक हो ही नहीं सकता।
- बच्चा अगर शांत स्वाभाव का है तो उसे इस विषय की ज्यादा बातें बता सकते हैं, जबकि चंचल बच्चों को थोड़ा कम ज्ञान देना ही ठीक रहता है।
- अगर कभी बच्चे के किसी सवाल का जवाब मालूम नहीं है या उसने कोई ऐसा प्रश्न पूछ डाला जिसका जवाब देने में आप झिझकते हैं या देना नहीं चाहते तो आप उससे कह सकते हैं - तुम्हारा सवाल बहुत अच्छा है, लेकिन हमें भी इसका जवाब पता नहीं है। हम इसका जवाब मालूम करने की कोशिश करेंगे और फिर तुम्हें बताएंगे।
- ध्यान रखें मां-बाप का आपस में और बच्चे के प्रति जैसा बर्ताव होगा, बच्चा सेक्स संबंधी ज्ञान को उसी के अनुरूप लेगा। जिन मां-बाप के बीच प्रेम होता है और जो बच्चे को भी इस बात का एहसास कराते हैं कि वे उसे बहुत प्यार करते हैं , उनके बच्चों के सेक्स संबंधी ज्ञान में ज्यादा और बेहतरीन तरीके से बढ़ोतरी होती है।
                                                                                                                           वैद्य एस0के0यादव

जब आपका बच्चा पहली बार जाए स्कूल


जब आपका बच्चा पहली बार जाए स्कूल
अगर आपका बच्चा पहली बार स्कूल जा रहा है, तो ज्यादा हाय-तौबा न मचाएं। बस कुछ बातों का ध्यान रखें, ताकि उसे स्कूल में कोई दिक्कत न आए—
आपके बच्चे का नर्सरी क्लास में एडमिशन हो गया है, तो लाजिमी है कि इन दिनों आप लगातार इसी फिक्र में घुल रहे होंगे। सोच रहे होंगे कि बच्चे को क्या पहनाएं, किस तरह का बैग लें, हेयर कटिंग कैसी हो, टिफिन में क्या भेजें वगैरह। ऐसी कशमकश उन पैरंट्स में ज्यादा देखने को मिलती है, जो पहली बार बच्चे को स्कूल भेज रहे होते हैं। आखिर हो भी क्यों न, उनका भी तो यह फर्स्ट एक्सपीरियंस होता है, जिससे वह कई चीजों को लेकर कन्फ्यूजन में रहते हैं।
चाइल्ड स्पेशलिस्टों का कहना है कि पहले बच्चे के दौरान पैंरट्स इस प्रेशर में रहते हैं कि क्या करना ठीक रहेगा और क्या नहीं। बच्चे को स्कूल में कोई दिक्कत न आए, वह क्लास में किसी वजह से दूसरे बच्चों से पीछे न रहे, यह प्रेशर उनको ओवर कॉन्शस रखता है। इसके चलते वे बच्चे को लेकर कभी- कभार ओवर प्रोटेक्टिव भी हो जाते हैं।
अगर आपका बच्चा भी पहली बार स्कूल जा रहा है, तो परेशान न हों, बस रखें कुछ बातों का ध्यान —
- अगर स्कूल यनिफॉर्म है, फिर तो कोई झंझट नहीं। अगर नहीं है, तो रोजाना साफ- सुथरी ड्रेस पहनाकर भेजें। चूंकि बच्चा अभी छोटा है, तो बैग में नैपकिन जरूर रखें, ताकि हाथ गंदे होने पर वह साफ कर पाए।
- बच्चे का आई कार्ड जेब पर रखना कतई न भूलें। यह आपके बच्चे की आइडेंटिटी है। दरअसल, इसमें बच्चे की क्लास, सेक्शन वगैरह लिखा होता है। अगर बच्चा क्लास से बाहर कहीं निकल भी गया और वापस क्लास में नहीं पहुंच पा रहा है, तो इसकी हेल्प से स्कूल में कोई भी उसे आसानी से उसकी क्लास व बस तक पहुंचा देगा।
- बच्चे को स्कूल बस के समय से तकरीबन 50 मिनट पहले उठा लें। ताकि उसे तैयार होने तक पूरा समय मिल सके। लेकिन एक बात का ध्यान रखें कि वह सुबह समय पर तभी उठेगा, जब आप रात को उसे आप समय पर सुलाएंगी।
- बच्चे के लिए 8 से 10 घंटे की नींद बेहद जरूरी है। इसलिए रात को उसे उसी हिसाब से सुलाएं। अगर उसकी नींद पूरी नहीं होगी, तो उसका ध्यान क्लास एक्टिविटीज में नहीं लग पाएगा।
- बच्चे का स्कूल टिफिन तैयार करना किसी बड़े झंझट से कम नहीं होता। समझ में नहीं आता कि रोज क्या बनाएं, जो हेल्दी तो हो ही और बच्चा भी खुशी से खा ले। लेकिन प्लानिंग से आप इसका ध्यान रख सकते हैं। टिफिन में फ्रूट्स डालें , लेकिन इस तरह से कि उसे खाने में मजा आए। बच्चे के मनपसंद फ्लेवर लगाकर सैंडविच को फैंसी शेप में काटें। शुरू में टिफिन में उसकी मनपसंद चीजें रखें। जब उसे एक बार टिफिन की आदत पड़ जाए, तो फिर धीरे- धीरे उसका टेस्ट दूसरी चीजों की तरफ डिवेलप करें।
- घर आकर एक बार उससे दिनभर की एक्टिविटीज पर जरूर डिस्कस करें। इससे बच्चे को लगेगा कि आपको भी उसकी स्कूल एक्टिविटीज में इंटरेस्ट है।
- उसकी सभी चीजों को गौर से सुनें। अच्छी चीजों पर उसकी तारीफ करें। लेकिन गलत चीजों पर डांटे नहीं और न ही उस समय रिएक्ट करें। फिर कभी जब बच्चा अच्छे मूड में हो, तो उसे प्यार से उस बात को लेकर गलत व सही समझाएं।
- उससे उसकी फ्रेंड्स के बारे में भी बातचीत करते रहें। इससे आपको पता चलता रहेगा कि आपका बच्चा किस तरह के फ्रेंड सर्कल में मूव कर रहा है और किन विषयों में इंटरेस्ट ले रहा है।
- बच्चों के बिहेवियर पर नजर रखें। अगर आपको कुछ नेगेटिव चेंज नजर आ रहे हैं, तो तुरंत जाकर टीचर्स से मिलें। इससे आप समय रहते ही चीजों को संभाल पाएंगे।
- अगर बच्चा किसी वजह से परेशान है, तो उस समय उसे समस्या को हल करने का सही तरीका बताएं। एक- दो बार ऐसे एक्सपीरियंस के बाद उसमें समस्याओं से लड़ने की ताकत आ जाएगी और फिर वह बड़ी से बड़ी दिक्कतें भी बिना किसी तनाव के हल कर लेगा।
                                                                                                                  वैद्य एस0के0यादव

कब क्यूं और कौनसा टेस्ट कराएं

परिवार के खयाल के साथ आपको अपनी हेल्थ का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है। हाल ही में आई एक रिसर्च की मानें, तो महिलाओं की डेथ होने की खास वजह उनकी बीमारी का देर से पता चलना है। तो क्यों ना उम्र के हर पड़ाव पर टेस्ट करवाकर इससे बचा जाए। जानते हैं इनके बारे में—
एक परफेक्ट बेटी, मां और बीवी बनने में आपका समय कहां छू मंतर हो जाता है, ये आपको खुद ही पता नहीं चलता होगा। लेकिन क्या ये जरूरी नहीं कि आप फैमिली के साथ-साथ अपनी हेल्थ का भी ख्याल रखें। आप खुद ठीक रहेंगी, तभी तो सबकुछ ठीक रख पाएंगी। वैसे, आप समय-समय पर टेस्ट करवाकर अपना हेल्थ स्टेटस चेक कर सकती हैं। आप टीनेजर हैं या शादीशुदा, कुछ टेस्ट करवा सकती हैं। देखा जाए, तो बच्ची के जन्म के समय से ही इन टेस्ट्स की शुरुआत हो जाती है।
बर्थ के टाइम पर 
बच्ची के पैदा होते ही सबसे पहले थॉयराइड और मेटाबॉलिक टेस्ट किया जाता है। इनके जरिए ये देखा जाता है कि बच्ची फिट है या नहीं। इन टेस्ट्स से यह जानने की कोशिश की जाती है कि बच्ची को कोई जन्मजात प्रॉब्लम तो नहीं है। उसके मेंटल लेवल की जांच भी की जाती है।
गर हों टीनेजर 
जब लड़की टीनएज में कदम रखती है, तो उस समय डॉक्टर हीमोग्लोबिन , थॉयराइड और ब्लड शुगर टेस्ट करवाने की सलाह देते हैं। हीमोग्लोबिन टेस्ट के जरिए ब्लड में आयरन की क्वांटिटी, ब्लड शुगर के जरिए ब्लड में शुगर का लेवल और थॉयराइड टेस्ट से थॉयराइड ग्लैंड से निकलने वाले हॉर्मोंस की क्वांटिटी की जांच की जाती है। बता दें कि यह ऐसा समय होता है जब बॉडी में कई तरह के हार्माेनल चेंजेज आते हैं और इसी उम्र में पीरियड भी शुरू होते हैं।
मैरिज के करीब 
शादी की उम्र यानी 20 से 30 साल के दौरान डॉक्टर लीवर फंक्शन टेस्ट , हीमोग्लोबिन, ब्लड और कोलेस्ट्रॉल चेक करवाने की सलाह देते हैं। अगर आप फैटी हैं और साथ में आपके पीरियड्स भी डिस्टर्ब रहते हैं, तो हार्मोन प्रोफाइल टेस्ट और अल्ट्रासाउंड टेस्ट भी करवा लें। दरअसल, लाइफस्टाइल में आने वाले चेंजेज से होने वाली बीमारियों की रोकथाम में ये टेस्ट हेल्प करते हैं।
30 की उम्र के बाद  
30 साल की उम्र के बाद गाइनोकॉलिजिकल एग्जामिनेशन और ब्रेस्ट सेल्फ एग्जामिनेशन करवाने जरूरी होते हैं। ये उनके लिए भी बेहद जरूरी हैं, जिन महिलाओं को पीरियड्स के दौरान दर्द होता है या जिनके परिवार में पहले किसी को कैंसर हो चुका है या फिर जिनकी डिलीवरी प्री - मैच्योर हुई हो।
प्रेग्नेंसी के दौरान 
प्रेग्नेंसी के दौरान मां और बच्चे की हेल्थ को देखने के लिए ब्लड ग्रुप, आरएच फैक्टर, टॉर्च टेस्ट, ट्रिपल टेस्ट ( अगर बच्चे में कोई जेनेटिक खराबी हो या इस बारे में कोई शक हो ), एचआईवी टेस्ट , एचपीवी टेस्ट , थॉयराइड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड टेस्ट करवाने की सलाह दी जाती है। इनमें से किसी भी टेस्ट का रिजल्ट खराब आने पर आसानी से पता लग जाता है कि बच्चे का डिवेलपमेंट सही तरह से हो रहा है या नहीं।
एग टाइम ब्लड टेस्ट 
अगर आप यह जानना चाहती हैं कि किस मंथ में आप कंसीव कर पाएंगी, तो एग टाइम ब्लड टेस्ट करवा सकती हैं। यह टेस्ट फर्टिलिटी हार्मोन का स्तर नापकर यह बता देता है कि एक महिला के ओवरीज से कितने ओवम बाहर आ सकते हैं। यह खासतौर से उन महिलाओं के लिए बेहद जरूरी है, जो किसी लंबी बीमारी से गुजर रही हैं।
40 की उम्र के बाद  
यह उम्र का वह पड़ाव है, जिसमें थोड़ा सी भी अनदेखी या चूक कई जानलेवा बीमारियों को न्योता देती है। इस समय पैप स्मीयर टेस्ट करवाना जरूरी है, ताकि सर्वाइकल कैंसर से बचा जा सके। दरअसल, यह ब्रेस्ट कैंसर का शुरुआती दौर होता है। इस उम्र में होने वाले कुछ खास दूसरे टेस्ट हैं जैसे हीमोग्लोबिन टेस्ट , लीवर फंक्शन टेस्ट या किडनी फंक्शन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड, पैप स्मीयर टेस्ट ( सर्वाकइल कैंसर की जांच के लिए, मैमोग्राफी ( ब्रेस्ट कैंसर की जांच के लिए ), बोन डेन्सीटोमेट्री ( हड्डियों की मजबूती जांचने के लिए ), ईसीजी और चेस्ट एक्सरे ( जरूरत पड़ने पर ) वगैरह।
मिनोपॉज के वक्त 
मिनोपॉज की स्थिति अमूमन 40 साल की उम्र के बाद आती है। अगर महिला को हार्ट प्रॉब्लम है, तो ईसीजी करवाना जरूरी है। इस समय सोनोग्राफी कराना ठीक रहता है। क्योंकि इससे एब्डोमन के सभी अंग लिवर, तिल्ली, किडनी, पैनक्रियाज की भी स्क्रीनिंग हो जाती है। साथ ही आंखों को भी चेक करवा लें।
जब आप हों जायें 50 की
इस उम्र में ब्लड, यूरीन, ईसीजी, लि​िपड प्रोफाइल, ब्लड शुगर, सोनोग्राफी और ओवरी स्ट्रेस टेस्ट करवाए जाते हैं। दरअसल उम्र बढ़ने के साथ कई बीमारियां दस्तक देनी शुरू कर देती हैं। यही समय होता है, जब उन्हें शुरुआती अवस्था में ही पकड़ा जा सकता है।
                                                                                                                        वैद्य एस0के0यादव