Thursday, January 4, 2018

पुरुषों के बांझपन को दूर करता है कटहल


 कटहल को फल कहिए या सब्‍जी, आयुर्वेद में कटहल के औ‍षधीय गुणों के बारे में बताया गया है। यह न सिर्फ सेहत के लिए बल्कि सौंदर्य के लिहाज से भी कटहल काफी गुणवर्धक माना गया है। कटहल में कई पौष्टिक तत्‍व पाए जाते हैं जैसे, विटामिन A, C, थाइमिन, पोटैशियम, कैल्‍शियम, राइबोफ्लेविन, आयरन, नियासिन और जिंक यही नहीं इसमें खूब सारा फाइबर भी पाया जाता है। इन सभी गुणों के वजह से कटहल लोगों को खूब भाता है। आज हम आपको कटहल में मौजूद पोषक तत्‍वों और उनसे म‍िलने वाले फायदों के बारे में बता रहे हैं, जिन्‍हें जानने के बाद आप कटहल को पहले से भी ज्‍यादा पसंद करने लगेंगे:
बालों के लिए वरदान कटहल के बीज
कटहल बालों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह बालों के ब्‍लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है, साथ ही बालों की चमक बढ़ाता है और बालों को स्वस्थ बनाएं रखता है। इसके अलावा कटहल के फल में मैग्नीज की मात्रा भरपूर होती है जिससे ब्लड शुगर कंट्रोल होता है। शीघ्रपतन
आयुर्वेद के अनुसार कटहल स्पर्म काउंट बढ़ाने के साथ कामेच्छा भी बढ़ाता है। पका कटहल बांझ पुरुषों में स्पर्म की मोबिलिटी और क्वालिटी बढ़ाने में मददगार है। पुरुषों में शीघ्रपतन के इलाज के लिए भी कहटल काम में लिया जाता है।
हडि्डयों के लिए अच्छा
शरीर की हडि्डयों के लिए ये बेस्ट है इसमें भरपूर कैल्शियम होता है। क्या आपको पता है मुट्ठी भर कटहल में 56.1 मिलीग्राम कैल्शियम होता है। इससे आपकी रोज की 6 फीसदी कैल्शियम की जरूरत पूरी हो जाती है।
एंटी एजिंग के लिए बढिया
कटहल एंटी एजिंग भी है। ये स्किन को डैमेज और झुर्रियों से बचाने में मददगार है। उम्र आपके चेहरे से न झलके, इसके लिए कटहल खाएं। कटहल में फाइबर और पानी की मात्रा अधिक होती है। ये पाचन को ठीक करता है। कब्ज से मुक्ति दिलाता है। पाचन क्रिया करे दुरुस्‍त एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर कटहल एंटी कैंसर होता है। कटहल पाचन तंत्र से सभी विषाक्त पदार्थ बाहर निकालता है। ब्लड प्रेशर कम करने में कारगर है। रोज की 14 फीसदी पोटेशियम की जरूरत एक कप कटा हुआ कटहल खाने से पूरी हो जाती है। इससे आप दिल की बीमारियों से दूर रहते हैं।
चेहरे की कांति
कटहल के बीज का चूर्ण बना कर उसमें थोड़ा शहद मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरा साफ हो जाता है और दाग-धब्बे मिट जाते हैं। जिन लोगों की चेहरा रुखा और बेजान होता है उन लोगों को कटहल का रस अपने चेहरे पर लगाना चाहिए, इसकी मसाज तब तक करें जब तक यह सूख न जाए फिर थोड़ी देर के बाद अपना चेहरा पानी के साथ धो लें।
दिल का रखे ख्याल
कटहल में कैलोरी नहीं होती है, यह दिल के रोगियों के लिये उपयोगी माना जाता है। कटहल में पोटैशियम पाया जाता है जो कि दिल की हर समस्‍या को दूर करता है क्‍योंकि यह ब्‍लड प्रेशर को कम कर देता है।
एनिमिया भगाए
एनीमिया में भी कटहल अच्छा है। इसमें मिनरल्स और विटामिन होते हैं। कटहल में विटामिन ए, सी, ई और के के साथ-साथ फोलिक एसिड, नियासिन और विटामिन बी-6 होते हैं। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन ए होता है, जो आंखों के लिए अच्छा होता है।
इम्युनिटी बढ़ाए
कटहल में भरपूर मात्रा में विटामिन सी होता है। इससे इम्युनिटी मजबूत होती है। थायराइड हार्मोन के नियंत्रण में मदद करता है। कटहल में कॉपर भी होता है। वजन बढ़ाने के लिए ऊर्जा का अच्छा स्रोत है। यह कार्बोहाइड्रेट भरपूर है। आपको बता दें एक कप कटहल में 40 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है। सही तरीके से वजन बढ़ाना चाहते हैं, तो कटहल खाएं।
                                                                                                                             वैद्य सुदेश यादव जख्मी

Saturday, June 11, 2016

जानें क्या हो सकते हैं हृदयाघात के लक्षण

शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर महीने भर पहले दिल के मरीजों में ये लक्षण पहचान लिए जाएं, तो हृदयाघात को रोकने में काफी हद तक मदद मिल सकती है। आइए हृदयाघात के कई दिनों पहले से ही पता लगने वाले लक्षणों के बारे में जानें।
पहले दिखने वाले लक्षण
अमरीकन हार्ट एसोसिएशन्‍स साइंटिफिक सेशंस में हुए एक नए शोध के अनुसार, हृदयाघात के लक्षण करीब एक महीने पहले से ही दिखने लग जाते हैं। एक महीने पहले से सीने में हल्का दर्द, सांस लेने में दिक्कत, फ्लू की समस्या और घबराहट जैसे लक्षण दिखने देने लगते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर महीने भर पहले दिल के मरीजों में ये लक्षण पहचान लिए जाएं, तो हृदयाघात को रोकने में काफी हद तक मदद मिल सकती है। आइए हृदयाघात के कई दिनों पहले से ही पता लगने वाले लक्षणों के बारे में जानें।
थकान और सांस की तकलीफ
थकान और सांस की तकलीफ में आपके शरीर को आराम की जरूरत हैं, लेकिन यह दिल पर अतिरिक्त तनाव के कारण हृदयाघात का लक्षण भी हो सकता है। यदि आप बिना किसी कारण के अक्सर थक जाते हैं या हमेशा थका-थका महसूस करते हो तो यह परेशानी का सबब हो सकता है। थकान और सांस की तकलीफ महिलाओं में आम होती हैं और हृदयाघात होने से कई दिनों पहले शुरू हो जाती है।
बहुत अधिक पसीना आना
बिना किसी कार्य और एक्सरसाइज के सामान्य से अधिक पसीना आना हृदय की समस्याओं की पूर्व चेतावनी संकेत हैं। अवरुद्ध धमनियों के माध्यम से रक्त को दिल तक पंप करने के लिए बहुत अधिक प्रयास करना पड़ता हैं। जिससे आपके शरीर को अतिरिक्त तनाव में शरीर के तापमान को नीचा बनाए रखने के लिए अधिक पसीना आता है। अगर आपको बहुत अधिक पसीना आता है और चिपचिपी त्वचा का अनुभव होता हैं, तो तुरंत अपने चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।
मतली और अपच 
हृदयाघात से पहले हल्के अपच और अन्य गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं देखने को मिलती हैं। लेकिन हम अक्सर इसको नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि हृदयाघात की समस्या आमतौर पर बड़े लोगों में पाई जाती हैं और उनमें आमतौर पर अधिक अपच की समस्या होती हैं। सामान्य रूप से पेट में दर्द, अपच, हार्ट बर्न या उल्टी की समस्‍या होना हृदयाघात का संकेत हो सकता है।
बेचैनी, दबाव और सीने में दर्द
सीने में दर्द या बेचैनी हृदयाघात का सबसे सामान्य लक्षण है, हालांकि, कुछ लोगों को बिल्कुल भी सीने में दर्द का अनुभव नहीं होता। छाती के बीच में बेचैनी, दबाव, दर्द, जकड़न और भारीपन अनुभव करने पर तुरंत अपने डाक्टर से संपर्क करें।
शरीर में जकडन और दर्द
दर्द और जकड़न शरीर के अन्य हिस्सों में भी हो सकता है। इसमें बाहों, कमर, गर्दन और जबड़े में दर्द या भारीपन भी महसूस हो सकता है। कभी-कभी यह दर्द शरीर के किसी भी हिस्से से शुरू होकर सीधे सीने तक भी पहुंच सकता है। इन लक्षणों की अनदेखी नही करनी चाहिए और संभावित हार्ट अटैक के लिए इनकी जांच की जानी चाहिए।
हर समय भरा हुआ सा महसूस होना
हृदयाघात के पहले से दिखने वाले लक्षणों में परिपूर्णता की भावना भी आती है। इसमें व्यक्ति को हर समय भरा हुआ सा महसूस होता है। ऐसा इसलिए होता है क्‍योंकि जब ऑक्सीजन युक्त रक्त संचार प्रणाली के माध्यम से नहीं जा पाता तब शरीर पेट में दर्द के संकेतों को भेजकर जवाब देता है।
घबराहट
लगातार होनी वाली चिंता और घबराहट को जीवन में होने वाले विशिष्ट तनाव से नहीं जोड़ा जा सकता है। रात को सोने में कठिनाई होना या रात में चिंता या संकट की भावना के कारण अचानक से उठ जाना भी हृदयाघात के पहले से दिखने वाले लक्षण हैं।
फ्लू जैसे लक्षण
चिपच‍िपी और पसीने से तर त्वचा, थका हुआ और कमजोर महसूस होने को अक्सर लोग फ्लू के लक्षण मान लेते हैं। लेकिन वास्तव में यह हृदयाघात का लक्षण हो सकता है। इसके अलावा सीने में भारीपन या दबाव की भावना को भी लोग चेस्ट कोल्ड और फ्लू होने के नाम से भ्रमित होते हैं लेकिन यह हृदयाघात के लक्षण हो सकतो हैं। ऐसा कोई भी लक्षण दिखाई देेने पर तुरंत डाक्‍टर से संपर्क करें।
हार्ट का तेजी से धड़कना
कभी-कभी हृदयघात से पहले दिखने वाले अधिक समान्य लक्षण जैसे तेजी से और अनियमित रूप से पल्स और हार्ट रेट का चलना हृदय की धड़कन में असामान्य तेजी के रूप में जाना जाता है। यदि यह समस्‍या अचानक से आ जाती हैं तो इस अवधि के दौरान आपका दिल बहुत तेजी से और मुश्किल से धड़कता हैं और यह हृदयाघात का लक्षण हो सकता है।
                                                                                                                                वैद्य एस0के0यादव

Sunday, August 30, 2015

अपनी किडनी का रखें ख्याल, स्वस्थ गुर्दा, स्वस्थ शरीर

मानव शरीर में प्रत्येक अंग की तरह किडनी यानी कि गुर्दा भी एक महत्वपूर्ण अंग है। यह पूरे मानव शरीर का एक मात्र ऐसा जोड़ा अंग है जिसमें एक के निष्क्रिय हो जाने के बाद भी आदमी जीवित रह सकता है। मनुष्य को जागरूक करने लिए मार्च महीने के दूसरे गुरुवार को विश्व गुर्दा दिवस मनाया जाता है। निसंदेह इसका मकसद लोगों को शरीर के इस महत्वपूर्ण अंग के प्रति सचेत और जागरूक करना ही है। मगर आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और खानपान के असंतुलन से जाने-अंजाने
इस अंग को बीमारियों ने घेर लिया है।
गुर्दे शरीर में फिल्टर का काम करते हैं 
शरीर में दो गुर्दे होते है, जो रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ पेट के पिछले भाग में होते है। मूल रूप से गुर्दे हमारे शरीर में उत्पन्न हुए जहर को बाहर निकालकर खून की सफाई का काम करते है। दरअसल गुर्दे हमारे शरीर में फिल्टर का काम करते है। इससे शरीर में पानी व नमक की मात्रा नियंत्रित रहती है। गुर्दे फिल्टर के अलावा खून की कमी को भी दूर करते है और हड्डियों को मजबूत रखते है। यदि किसी व्यक्ति के गुर्दो में दिक्कत होती है तो फिर शरीर के दूसरे अंग भी ठीक तरह से काम नहीं करते। आज जबकि रक्तचाप यानी ब्लड प्रेशर और शुगर की बीमारी बढ़ रही है तो उससे गुर्दो के लिए भी परेशानी बढ़ गई है। इन दोनों रोगों का गुर्दो पर सबसे ज्यादा विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। स्वाभाविक है कि जब गुर्दे ठीक से काम नहीं करेंगे तो इससे शरीर में रोगों की संख्या भी बढ़ती जाती है। यदि शरीर में लगातार ऐसी स्थिति बनी रहती है तो एक समय के बाद गुर्दे काम करना बंद कर देते है।
सावधानी और खान-पान नियंत्रण से गुर्दा रहेगा सुरक्षित
गुर्दो में भी कई रोग होते है जैसे पथरी, मूत्राशय में संक्रमण व रूकावट, कैंसर आदि। वैसे तो आज की अत्याधुनिक पद्धति से इलाज के चलते गुर्दे के रोगों का इलाज भी काफी हद तक संभव हो रहा है लेकिन सावधानी और जागरूकता से इन रोगों से बचाव भी हो सकता है।
-गुर्दे की बीमारी के लक्षण
पेशाब में खून आना
पेशाब की मात्रा में कमी होना
पैरों व आखों में सूजन आना
शीघ्र थकान महसूस होना
पेशाब में जलन होना और बार-बार आना
ब्लड प्रेशर अनियंत्रित होना
-गुर्दे की बीमारी से बचने के उपाय
नियमित व्यायाम करे
रोजाना तीन से चार लीटर पानी पीएं
दर्द की गोलियों का अनावश्यक सेवन न करे
ब्लड प्रेशर व शूगर की नियमित जाच कराएं
धूम्रपान, शराब के सेवन और फास्ट फूड से बचें
खाने में नमक की मात्रा कम रखें
35 वर्ष की उम्र के बाद खून व पेशाब की जाच अवश्य कराएं
गुर्दे की बीमारी का शीघ्र पता चलने पर इसमें पूर्ण इलाज संभव है और बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। इसलिए जरूरी है कि ब्लड प्रेशर व डायबिटिज की नियमित जांच कराई जाए।
वैद्य— एस के यादव 

Thursday, May 21, 2015

मधुमेह

मधुमेह या चीनी की बीमारी अर्थात एक खतरनाक रोग है। यह बीमारी हमारे शरीर में अग्नाशय द्वारा इंसुलिन का स्त्राव कम हो जाने के कारण होती है। रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है, साथ ही इन मरीजों में रक्त कोलेस्ट्रॉल, वसा के अवयव भी असामान्य हो जाते हैं। धमनियों में बदलाव होने लगता हैं। इन मरीजों में आँखों, गुर्दे, स्नायु, मस्तिष्क, हृदय के क्षतिग्रस्त होने से इनके गंभीर, जटिल, व घातक रोग का खतरा बढ़ जाता है।
मधुमेह होने पर शरीर में भोजन को ऊर्जा में परिवर्तित करने की सामान्य प्रक्रिया तथा होने वाले अन्य परिवर्तनों का विवरण इस प्रकार से है। किया गया भोजन पेट में जाकर एक प्रकार के ईंधन में बदलता है जिसे ग्लूकोज कहते हैं। यह एक प्रकार की शर्करा होती है। ग्लूकोज रक्त धारा में मिलता है और शरीर की लाखों कोशिकाओं में पहुंचता है। अग्नाशय वह अंग है जो रसायन उत्पन्न करता है और इस रसायन को इंसुलिन कहते हैं। इनसुलिन भी रक्तधारा में मिलता है और कोशिकाओं तक जाता है। ग्लूकोज से मिलकर ही यह कोशिकाओं तक जा सकता है। शरीर को ऊर्जा देने के लिए कोशिकाएं ग्लूकोज को उपापचित (जलाती) करती है। ये प्रक्रिया सामान्य शरीर में होती हैं।
मधुमेह होने पर शरीर को भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने में कठिनाई होती है। पेट फिर भी भोजन को ग्लूकोज में बदलता रहता है। ग्लूकोज रक्त धारा में जाता है। किन्तु अधिकांश ग्लूकोज कोशिकाओं में नही जा पाते जिसके कारण इस प्रकार हैं—
इंसुलिन की मात्रा कम हो सकती है।
इंसुलिन की मात्रा अपर्याप्त हो सकती है किन्तु इससे रिसेप्टरों को खोला नहीं जा सकता है।
पूरे ग्लूकोज को ग्रहण कर सकने के लिए रिसेप्टरों की संख्या कम हो सकती है।
अधिकांश ग्लूकोज रक्तधारा में ही बना रहता है। यही हायपर ग्लाईसीमिया (उच्च रक्त ग्लूकोज या उच्च रक्त शर्करा) कहलाती है। कोशिकाओं में पर्याप्त ग्लूकोज न होने के कारण कोशिकाएं उतनी ऊर्जा नहीं बना पाती जिससे शरीर सुचारू रूप से चल सके।
 मधुमेह के प्रकार
1 टाइप–। (इंसुलिन आश्रित मधुमेह)
2 टाइप-।। (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह)
3 एम.आर.डी.एम.(कुपोषण जनित मधुमेह)
4 आई.जी.टी. (इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस)
5 जैस्टेशनल डायबिटीज (गर्भावस्था के दौरान)
6 सेकेंडरी डायबिटीज
  मधुमेह में अन्य अनियमितताएं
 1 रक्तचाप
 2 कोलेस्ट्रोल
 3 मधुमेह के संग हृदय-धमनी रोग
     प्रबंधन
 1 व्यायाम
 2 त्वचा की देख-भाल
   जीन थेरैपी
    देखभाल
 1 घावों की देखभाल
 2 पैरों की देखभाल
  मधुमेह संबंधी आहार
मधुमेह के सामान्य लक्षण
मधुमेह होने के कई लक्षण रोगी को स्वयं अनुभव होते हैं। इनमें बार-बार पेशाब आते रहना (रात के समय भी), त्वचा में खुजली होना, धुंधला दिखना, थकान और कमजोरी महसूस करना, पैरों का सुन्न होना, प्यास अधिक लगना, कटान/घाव भरने में समय लगना, हमेशा भूख महसूस करना, वजन कम होना और त्वचा में संक्रमण होना आदि प्रमुख हैं।
उपरोक्त लक्षणों के साथ-साथ यदि त्वचा का रंग, कांति या मोटाई में परिवर्तन दिखे, कोई चोट या फफोले ठीक होने में सामान्य से अधिक समय लगे, कीटाणु संक्रमण के प्रारंभिक चिह्न जैसे कि लालीपन, सूजन, फोड़ा या छूने से त्वचा गरम हो,योनि या गुदा मार्ग, बगलों या स्तनों के नीचे तथा अंगुलियों के बीच खुजलाहट हो, जिससे फफूंदी संक्रमण की संभावना का संकेत मिलता है या कोई न भरने वाला घाव हो तो रोगी को चाहिये कि चिकित्सक से शीघ्र संपर्क करे।
मधुमेह रोग के प्रमुख लक्षण ये हैं-
रोगी का मुँह खुश्क रहना तथा अत्यधिक प्यास लगना।
भूख अधिक लगना।
अधिक भोजन करने पर भी दुर्बल होते जाना।
बिना कारण रोगी का भार कम होना, शरीर में थकावट के साथ-साथ मानसिक चिन्तन एवं एकाग्रता में कमी होना।
मूत्र बार-बार एवं अधिक मात्रा में होना तथा मूत्र त्यागने के स्थान पर मूत्र की मिठास के कारण चीटियाँ लगना।
शरीर में व्रण अथवा फोड़ा होने पर उसका घाव जल्दी न भरना।
शरीर पर फोड़े-फुँसियाँ बार-बार निकलना।
शरीर में निरन्तर खुजली रहना एवं दूरस्थ अंगों का सुन्न पड़ना।
नेत्र की ज्योति बिना किसी कारण के कम होना।
पुरुषत्वशक्ति में क्षीणता होना।
स्त्रियों में मासिक स्राव में विकृति अथवा उसका बन्द होना।
कारण
हमारे भोजन में कार्बोहाइड्रेट एक प्रमुख तत्त्व है, यही कैलोरी व ऊर्जा का स्रोत है। वास्तव में शरीर के 60 से 70% कैलोरी इन्हीं से प्राप्त होती है। कार्बोहाइड्रेट पाचन तंत्र में पहुंचते ही ग्लूकोज के छोटे-छोटे कणों में बदल कर रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं इसलिए भोजन लेने के आधे घंटे भीतर ही रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है तथा दो घंटे में अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है।
दूसरी ओर शरीर तथा मस्तिष्क की सभी कोशिकाएं इस ग्लूकोज का उपयोग करने लगती हैं। ग्लूकोज छोटी रक्त नलिकाओं द्वारा प्रत्येक कोशिका में प्रवेश करता है, वहां इससे ऊर्जा प्राप्त की जाती है। यह प्रक्रिया दो से तीन घंटे के भीतर रक्त में ग्लूकोज के स्तर को घटा देती है। अगले भोजन के बाद यह स्तर पुनः बढ़ने लगता है। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति में भोजन से पूर्व रक्त में ग्लूकोज का स्तर 70 से 100 मि.ग्रा./डे.ली. रहता है। भोजन के पश्चात यह स्तर 120-140 मि.ग्रा./डे.ली. हो जाता है तथा धीरे-धीरे कम होता चला जाता है।
मधुमेह में इंसुलिन की कमी के कारण कोशिकाएं ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर पातीं क्योंकि इंसुलिन के अभाव में ग्लूकोज कोशिकाओं में प्रवेश ही नहीं कर पाता। इंसुलिन एक द्वार रक्षक की तरह ग्लूकोज को कोशिकाओं में प्रवेश करवाता है ताकि ऊर्जा उत्पन्न हो सके। यदि ऐसा न हो सके तो शरीर की कोशिकाओं के साथ-साथ अन्य अंगों को भी रक्त में ग्लूकोज के बढ़ते स्तर के कारण हानि होती है। यदि स्थिति उस प्यासे की तरह है जो अपने पास पानी होने पर भी उसे चारों ओर ढूंढ़ रहा है।
इन द्वार रक्षकों (इंसुलिन) की संख्या में कमी के कारण रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ कर 140 मि.ग्रा./डे.ली. से भी अधिक हो जाए तो व्यक्ति मधुमेह का रोगी माना जाता है। असावधान रोगियों में यह स्तर बढ़ कर 500 मि.ग्रा./ड़े.ली. तक भी जा सकता है।
मधुमेह रोग जटिलताओं में भरा है। सालों साल यदि रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ा रहे तो प्रत्येक अंग की छोटी रक्त नलिकाएं नष्ट हो जाती हैं जिसे माइक्रो एंजियोपैथी कहा जाता है। तंत्रिकातंत्र की खराबी ‘न्यूरोपैथी, गुर्दों की खराबी ‘नेफरोपैथी’ व नेत्रों की खराबी ‘रेटीनोपैथी’ कहलाती है। इसके अलावा हृदय रोगों का आक्रमण होते भी देर नहीं लगती।
मधुमेह के प्रकार
डायबिटीज मेलाइट्स को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है–
1. आई.डी.डी.एम. इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मेलाइट्स (इंसुलिन, आश्रित मधुमेह) टाइप–।
2. एन.आई.डी.डी.एम. नॉन इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मेलाइट्स (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह) टाइप–॥
3. एम.आर.डी.एम. मालन्यूट्रिशन रिलेटिड डायबिटीज मेलाइट्स (कुपोषण जनित मधुमेह)
4. आई.जी.टी.(इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस)
5. जैस्टेशनल डायबिटीज
6. सैकेंडरी डायबिटीज
टाइप–। (इंसुलिन आश्रित मधुमेह)रें]
टाइप–। मधुमेह में अग्नाशय इंसुलिन नामक हार्मोन नहीं बना पाता जिससे ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा नहीं दे पाता। इस टाइप में रोगी को रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य रखने के लिए नियमित रूप से इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं। इसे ‘ज्यूविनाइल ऑनसैट . डायबिटीज’ के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग प्रायः किशोरावस्था में पाया जाता है। इस रोग में ऑटोइम्यूनिटी के कारण रोगी का वजन कम हो जाता है।
टाइप-।। (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह)
लगभग 90% मधुमेह रोगी टाइप-।। डायबिटीज के ही रोगी हैं। इस रोग में अग्नाशय इंसुलिन बनाता तो है परंतु इंसुलिन कम मात्रा में बनती है, अपना असर खो देती है या फिर अग्नाशय से ठीक समय पर छूट नहीं पाती जिससे रक्त में ग्लूकोज का स्तर अनियंत्रित हो जाता है। इस प्रकार के मधुमेह में जेनेटिक कारण भी महत्वपूर्ण हैं। कई परिवारों में यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता है। यह वयस्कों तथा मोटापे से ग्रस्त व्यक्तियों में धीरे-धीरे अपनी जड़े जमा लेता है।
अधिकतर रोगी अपना वजन घटा कर, नियमित आहार पर ध्यान देकर तथा औषधि लेकर इस रोग पर काबू पा लेते हैं।
एम.आर.डी.एम.(कुपोषण जनित मधुमेह)
भारत जैसे विकासशील देश में 15-30 आयु वर्ग के किशोर तथा किशोरियां कुपोषण से ग्रस्त हैं। इस दशा में अग्नाशय पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। रोगियों को इंसुलिन के इंजेक्शन देने पड़ते हैं। मधुमेह के टाइप–। रोगियों के विपरीत इन रोगियों में इंसुलिन के इंजेक्शन बंद करने पर कीटोएसिडोसिस विकसित नहीं हो पाता।
आई.जी.टी. (इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस)
जब रोगी को 75 ग्राम ग्लूकोज का घोल पिला दिया जाए और रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य तथा मधुमेह के बीच हो जाए तो यह स्थिति आई.जी.टी कहलाती है। इस श्रेणी के रोगी में प्रायः मधुमेह के लक्षण दिखाई नहीं देते परंतु ऐसे रोगियों में भविष्य में मधुमेह हो सकता है।
जैस्टेशनल डायबिटीज (गर्भावस्था के दौरान)
गर्भावस्था के दौरान होने वाली मधुमेह जैस्टेशनल डायबिटीज कहलाती है। 2-3% गर्भावस्था में ऐसा होता है। इसके दौरान गर्भावस्था में मधुमेह से संबंधित जटिलताएं बढ़ जाती हैं तथा भविष्य में माता तथा संतान को भी मधुमेह होने की आशंका बढ़ जाती है।
सेकेंडरी डायबिटीज
जब अन्य रोगों के साथ मधुमेह हो तो उसे सेकेंडरी डायबिटीज कहते हैं। इसमें अग्नाशय नष्ट हो जाता है जिससे इंसुलिन का स्राव असामान्य हो जाता है, जैसे–
रक्त शर्करा स्तर
ग्लूकोज़ ग्रहण करने और उपापचय पर इंसुलिन का प्रभाव। इंसुलिन अपने रिसेप्टर्स (१) से जुड़ा जाता है और रिसेप्टर बहुत सी प्रोटीन क्रियान्वयन प्रकार्य (२) आरंभ कर देते हैं। इनमें ग्लुट-४ यातायातक का प्लाज़्मा मेम्ब्रेन तक विस्थापन और ग्लूकोज़ का इन्फ्लक्स (३), ग्लाइकोजन संश्लेषण (४), ग्लाइकोलिसिस (५) एवं वसा अम्ल संश्लेषण (६) शामिल हैं।
मधुमेह में और सामान्यतया भी रक्त-शर्करा स्तर को सामान्य बनाये रखना आवश्यक होता है। यदि रक्त में शर्करा का स्तर लंबे समय तक सामान्य से अधिक बना रहता है तो उच्च रक्त ग्लूकोज अधिक समय के बाद विषैला हो जाता है। अधिक समय के बाद उच्च ग्लूकोज, रक्त नलिकाओं, गुर्दे, आंखों और स्नायुओं को खराब कर देता है जिससे जटिलताएं पैदा होती है और शरीर के प्रमुख अंगों में स्थायी खराबी आ सकती है। स्नायु की समस्याओं से पैरों अथवा शरीर के अन्य भागों की संवेदना चली जा सकती है। रक्त नलिकाओं की बीमारी से हृदयाघात हो सकता है, पक्षाघात और संचरण की समस्याएं पैदा हो सकती है। आंखों की समस्याओं में आंखों की रक्त नलिकाओं की खराबी (रेटीनोपैथी), आंखों पर दबाव (ग्लूकोमा) और आंखों के लेंस पर बदली छाना (मोतियाबिंद) हो सकते हैं। गुर्दे की बीमारी का कारण, गुर्दा रक्त में से अपशिष्ट पदार्थ की सफाई करना बंद कर देती है। उच्च रक्तचाप से हृदय को रक्त पंप करने में कठिनाई होती है।
मधुमेह में अन्य अनियमितताएं
रक्तचाप
हृदय धड़कने से रक्त नलिकाओं में रक्त पंप होता है और उनमें दबाव पैदा होता है। किसी व्यक्ति के स्वस्थ होने पर रक्त नलिकाएं मांसल और लचीली होती है। जब हृदय उनमें से रक्त संचार करता है तो वे फैलती है। सामान्य स्थितियों में हृदय प्रति मिनट 60 से 80 की गति से धड़कता है। हृदय की प्रत्येक धड़कन के साथ रक्त चाप बढ़ता है तथा धड़कनों के बीच हृदय शिथिल होने पर यह घटता है। प्रत्येक मिनट पर आसन, व्यायाम या सोने की स्थिति में रक्त चाप घट-बढ़ सकता है किंतु एक अधेड़ व्यक्ति के लिए यह 130/80 एम एम एचजी से सामान्यतः कम ही होना चाहिए। इस रक्त चाप से कुछ भी ऊपर उच्च माना जाएगा।
उच्च रक्त चाप के सामान्यतः कोई लक्षण नहीं होते हैं, वास्तव में बहुत से लोगों को सालों साल रक्त चाप बना रहता है किंतु उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं हो पाती है। इससे तनाव, हतोत्साह अथवा अति संवेदनशीलता से कोई संबंध नहीं होता है। आप शांत, विश्रान्त व्यक्ति हो सकते हैं तथा फिर भी आपको रक्तचाप हो सकता है। उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण न करने से पक्षाघात, दिल का दौरा, संकुलन हृदय गति रुकना या गुर्दे खराब हो सकते हैं। ये सभी प्राण घातक हैं। यही कारण है कि उच्च रक्तचाप को "निष्क्रिय प्राणघातक" कहा जाता है।
 कोलेस्ट्रोल
शरीर में उच्च कोलेस्ट्रोल का स्तर होने से दिल का दौरा पड़ने का का खतरा चार गुना बढ़ जाता है। रक्तधारा में अधिक कोलेस्ट्रोल होने से धमनियों की परतो पर प्लेक (मोटी सख्त जमा) जमा हो जाती है। कोलेस्ट्रोल या प्लेक पैदा होने से धमनियां मोटी, कड़ी और कम लचीली हो जाती है जिसमें कि हृदय के लिए रक्त संचारण धीमा और कभी-कभी रूक जाता है। जब रक्त संचार रुकता है तो छाती में दर्द अथवा कंठशूल हो सकता है। जब हृदय के लिए रक्त संचार अत्यंत कम अथवा बिल्कुल बंद हो जाता है तो इसका परिणाम दिल का दौड़ा पड़ने में होता है। उच्च रक्त चाप और उच्च कोलेस्ट्रोल के अतिरिक्त यदि मधुमेह भी हो तो पक्षाघात और दिल के दौरे का खतरा 16 गुना बढ़ जाता है।
 हृदय रोग
मधुमेह रोगियों में हृदय-रोग अपेक्षाकृत कम आयु में हो सकते हैं। दूसरा अटैक होने का खतरा सदैव बना रहता है।
रजोनिवृत्ति के पूर्व महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन के कारण हृदय रोगों का खतरा पुरुषों की अपेक्षा कम होता है। पर मधुमेह ग्रसित महिलाओं में यह सुरक्षा कवच निप्रभावी हो जाता है और इनके हृदय-रोग का खतरा पुरुषों के समकक्ष हो जाता है।
मधुमेह रोगियों में हृदय-धमनी रोग मौत का प्रमुख कारण है।
मधुमेह रोगियों में हृदय-रोग का खतरा मधुमेह की अवधि के साथ बढ़ता जाता है। इनमें हार्ट-अटैक ज्यादा गंभीर और घातक होता है। मधुमेह मरीजों में हार्ट-अटैक होने पर भी छाती में दर्द नहीं भी हो सकता है, क्योंकि दर्द का अहसास दिलाने वाला इनका स्नायु क्षतिग्रस्त हो सकता है। यह शांत हार्ट-अटैक' कहलाता है।
मधुमेह रोगियों को एन्जाइना होने पर श्वास फूलने, चक्कर आने, हृदय गति अनियमित होने का खतरा रहता है।
मधुमेह रोगियों में यदि रक्त का ग्लूकोज स्तर अत्यधिक बढ़ जाता है और रक्त में किरोन का स्तर भी बढ़ता है तो अचानक रक्त संचार की प्रणाली कार्य करना बंद कर देती है और उससे मौत हो सकती है।
मधुमेह रोगियों में विभिन्न कारणों से रक्त वाहिनियों में एथ्रीमो स्कोरोसिस के बदलाव कम आयु में शुरू होकर तेजी से होते हैं।
मधुमेह, हृदय-रोग, उच्च रक्तचाप तीनों ही जटिल, गंभीर व घातक रोग हैं। रोगों का घनिष्ठ संबंध जीवन-शैली से तो है ही, साथ ही तीनों रोगों का आपस में भी घनिष्ठ संबंध होता है। एक रोग होने पर दूसरे रोगों का खतरा बढ़ जाता है। रोग गंभीर, घातक, अनियंत्रित, लाइलाज हो सकते हैं। अत नियमित अंतराल में चिकित्सकीय परीक्षण करवायें, जिससे इन रोगों की शुरुआती अवस्था में ही पता लग सके।
प्रबंधन
मधुमेह होने के कारण पैदा होने वाली जटिलताओं की रोकथाम के लिए नियमित आहार, व्यायाम, व्यक्तिगत स्वास्थ्य, सफाई और संभावित इनसुलिन इंजेक्शन अथवा खाने वाली दवाइयों (डॉक्टर के सुझाव के अनुसार) का सेवन आदि कुछ तरीके हैं।
चिन्ता, तनाव, व्यग्रता से मुक्त रहें।
तीन माह में एक बार रक्त शर्करा की जाँच करावें।
भोजन कम करें, भोजन में रेशे युक्त द्रव्य, तरकारी, जौ, चने, गेहूँ, बाजरे की रोटी, हरी सब्जी एवं दही का प्रचुरमात्रा में सेवन करें। चना और गेहूँ मिलाकर उसके आटे की रोटी खाना बेहतर है। चना तथा गेहूँ का अनुपात 1:10 हो।
हल्का व्यायाम करें, शारीरिक परिश्रम करें अथवा प्रात: 4-5 कि.मी. घूमें।
मधुमेह पीड़ित मनुष्य नियमित एवं संयमित जीवन के लिये विशेष ध्यान रखें।
शर्करीय पदार्थों का सेवन बहुत सीमित करें।
स्थूल तथा अधिक भार वाले व्यक्ति अपना वजन कम रखने का प्रयत्न करें।
चरपरे एवं कषाय रसयुक्त आहार का विशेष सेवन करें।
मैथुन मधुमेह के रोगियों के लिये वर्जित नहीं है। मैथुन से शरीर का व्यायाम होता है अतः इसे समय-समय पर करते रहना चाहिये।
दवाओं का सेवन चिकित्सक के परामर्श से ही करें।
नित्य कुछ समय के लिये प्राणायाम अवश्य करना चाहिये। जहाँ तक संभव हो कुछ समय नंगे पैर जमीन पर अवश्य चलना, यदाकदा स्थान, जलवायु इत्यादि में भी बदलाव करें। शक्कर के स्तर की नियमित जाँच कराते रहें।
व्यायाम
व्यायाम से रक्त शर्करा स्तर कम होता है तथा ग्लूकोज का उपयोग करने के लिए शारीरिक क्षमता पैदा होती है। प्रतिघंटा 6 कि.मी की गति से चलने पर 30 मिनट में 135 कैलोरी समाप्त होती है जबकि साइकिल चलाने से लगभग 200 कैलोरी समाप्त होती है। मेथी दाने से डायबिटीज नियंत्रित हो जाती है। रात को 1 चम्मच मेथीदाना 1 गिलास गुनगुने पानी में भिगो दें। सुबह उठकर बिना कुल्ला किये मेथीदाना चबा-चबा कर खा लें और पानी को घूँट-घूँट कर पी लें। 2—3 महीने के अन्दर डायबिटीज पूरी तरह नियंत्रित हो जाता है।
मधुमेह के रोगियों को मंडूक आसन व "कपाल-भाति प्राणायाम" करने से बहुत लाभ होता है।
त्वचा की देख-भाल
मधुमेह के मरीजों को त्वचा की देखभाल करना अत्यावश्यक है। भारी मात्रा में ग्लूकोज से उनमें कीटाणु और फफूंदी लगने की संभावना बढ़ जाती है। चूंकि रक्त संचार बहुत कम होता है अतः शरीर में हानिकारक कीटाणुओं से बचने की क्षमता न के बराबर होती है। शरीर की सुरक्षात्मक कोशिकाएं हानिकारक कीटाणुओं को खत्म करने में असमर्थ होती है। उच्च ग्लूकोज की मात्रा से निर्जलीकरण (डी-हाइड्रेशन) होता है जिससे त्वचा सूखी हो जाती है तथा खुजली होने लगती है।
जीन थेरैपी
जीन थेरेपी:एक विषाणु वेक्टर को रक्त-शर्करा स्तर बदलने पर डीएनए कोशिकाओं को इंसुलिन के विषाणु उत्पादन के लिए बाध्य करना
मधुमेह के लिए चल रहे शोधों में वैज्ञानिकों ने जीन थेरैपी का सुझाव निकाला है। इसमें रोगी के शरीर में इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को स्वस्थ कोशिकाओं से यदि बदल दिया जाये तो यह कारगर सिद्ध हो सकता है। इसका प्रयोग एक रोगी चूहे पर किया और उसे स्वस्थ पाया।
देखभाल]
मधुमेह रोगियों को अपने शरीर की स्वयं देखभाल करनी चाहिये। उन्हें चाहिये कि हल्के साबुन या हल्के गरम पानी से नियमित स्नान करें। अधिक गर्म पानी से न नहाएं और नहाने के बाद शरीर को भली प्रकार पोछें तथा त्वचा की सिलवटों वाले स्थान पर विशेष ध्यान दें। वहां पर अधिक नमी जमा होने की संभावना होती है। जैसा कि बगलों, तथा उंगलियों के बीच। इन जगहों पर अधिक नमी से फफूंदी संक्रमण की अधिकाधिक संभावना होती है। त्वचा सूखी न होने दें। जब आप सूखी, खुजलीदार त्वचा को रगड़ते हैं तो आप कीटाणुओं के लिए द्वार खोल देते हैं। पर्याप्त तरल पदार्थों को लें जिससे कि त्वचा पानीदार बनी रहे।
घावों की देखभाल
समय-समय पर कटने या कतरने को टाला नहीं जा सकता है। मधुमेह की बीमारी वाले व्यक्तियों को मामूली घावों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि संक्रमण से बचा जा सके। मामूली कटने और छिलने का भी सीधे उपचार करना चाहिए। उन्हें यथाशीघ्र साबुन और गरम पानी से धो डालना चाहिए और फिर आयोडिन युक्त अलकोहाल या प्रतिरोधी द्रवों को न लगाएं क्योंकि उनसे त्वचा में जलन पैदा होती है। केवल डॉक्टरी सलाह के आधार पर ही प्रतिरोधी क्रीमों का प्रयोग करें। उन पर विसंक्रमित कपड़ा पट्टी या गाज से बांध कर जगह को सुरक्षित करें।
यदि बहुत अधिक कट या जल गया हो, त्वचा पर कहीं पर भी ऐसा लालीपन, सुजन, मवाद या दर्द हो जिससे कीटाणु संक्रमण की आशंका हो या रिंगवर्म, जननेंद्रिय में खुजली या फफूंदी संक्रमण के कोई अन्य लक्षण दिखे तो चिकित्सक से तुरंत संपर्क करें।
पैरों की देखभाल
मधुमेह की जटिल अवस्था : पैर की तीन अंगुलियों में गैंगरीन
मधुमेह की बीमारी में रक्त में ग्लूकोज के उच्च स्तर के कारण स्नायु खराब होने से संवेदनशीलता जाती रहती है। पैरों की नियमित जांच करें, पर्याप्त रोशनी में प्रतिदिन पैरों की नजदीकी जांच करें। देखें कि कहीं कटान और कतरन, त्वचा में कटाव, कड़ापन, फफोले, लाल धब्बे और सूजन तो नहीं है। उंगलियों के नीचे और उनके बीच देखना न भूलें। उनकी नियमित सफाई करें। हल्के साबुन से और गरम पानी से प्रतिदिन साफ करें व पैरों की उंगलियों के नाखूनों को नियमित काटते रहें। पैरों की सुरक्षा के लिए जूते पहनें।
मधुमेह संबंधी आहार
यह आहार भी एक स्वस्थ व्यक्ति के सामान्य आहार की तरह ही है, ताकि रोगी की पोषण संबंधी पोषण आवश्यकता को पूरी की जा सके एवं उसका उचित उपचार किया जा सके। इस आहार में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कुछ कम है लेकिन भोजन संबंधी अन्य सिद्धांतो के अनुसार उचित मात्रा में है। मधुमेह संबंधी समस्त आहार के लिए जड़ एवं कंद, मिठाइयाँ, पुडिंग और चॉकलेट, तला हुआ भोजन, सूखे मेवे, चीनी, केला, चीकू, सीताफल आदि जैसे फल आदि से बचा जाना चाहिए।
आहार नमूना
खाद्य सामग्री शाकाहारी भोजन (ग्राम में) मांसाहारी भोजन (ग्राम में)
अनाज २०० २५०  दालें ६० २० हरी पत्तेदार सब्जियाँ २०० २००
फल २०० २००    दूध (डेयरी का) ४०० २००    तेल २० २०
मछली/ चिकन-बगैर त्वचा का - १०० अन्य सब्जियाँ २०० २००
ये आहार आपको निम्न चीजें उपलब्ध कराता है-
कैलोरी १६००, प्रोटीन ६५ ग्राम, वसा ४० ग्राम, कार्बोहाइड्रेट २४५ ग्राम
वैद्य— एस0के0 यादव

Wednesday, May 20, 2015

गुर्दे खराब होने पर बरतें सावधानी


हमारे गुर्दे रक्त में उपस्थित अपशिष्ट पदार्थों और जल को फ़िल्टर कर मूत्र के रूप में बाहर निकालने की क्रिया संपन्न करते हैं। हमारी मांसपेशियों में उपस्थित क्रिएटिन फ़ास्फ़ेटस  के विखंडन से उर्जा उत्पन होती है और इसी प्रक्रिया में अपशिष्ट पदार्थ क्रिएटनीन बनता है । स्वस्थ गुर्दे अधिकांश क्रिएटनीन को फ़िल्टर कर मूत्र में निष्कासित करते रहते हैं। अगर खून में क्रिएटनीन का स्तर 1.5 से ज्यादा हो जाता है तो समझा जाता है कि गुर्दे ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। इसलिये खून में क्रिएटनीन की मात्रा का परीक्षण कराना जरूरी हो जाता है। अब कुछ ऐसे उपायों को व्यवहार में लाकर रोगी अपने खून मे क्रिटनीन की मात्रा घटा सकते हैं। ये ऊपाय गुर्दे का कार्य-भार कम करते हैं जिससे खून में उपस्थित क्रिएटनीन का लेविल कम होने में मदद मिलती है।  क्रिएटनीनीन कम करने वाले भोजन में प्रोटीन, फ़ास्फ़ोरस,पोटेशियम,नमक की मात्रा बिल्कुल कम होने पर ध्यान दिया जाता है। जिन भोजन पदार्थों में इन तत्वों की अधिकता हो उनका परहेज करना आवश्यक है। 
   जब उच्च प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ उपयोग नहीं किये जाएंगे तो मांसपेशियों में कम क्रिएटीन मौजूद रहेगा अत: क्रिएटनीन भी कम बनेगा। किडनी को भी अपशिष्ट पदार्थ  को फ़िल्टर करने में कम ताकत लगानी पडेगी जिससे किडनी की तंदुरस्ती में इजाफ़ा होगा। याद रखने योग्य है कि क्रिएटिन के टूटने से ही क्रिएटनीन बनता है।
       एक और जहां उच्च क्रिएटनीन लेविल गुर्दे की गंभीर विकृति की ओर संकेत करता है वही शरीर में जल की कमी से समस्या और गंभीर हो जाती है। जल की कमी से रक्तगत क्रिएटनीन में वृद्धि होती है। अत: महिलाओं को 24 घंटे में 2.5 लिटर तथा पुरुषों को 3.5 लीटर पानी पीने की सलाह दी जाती है। चाय,काफ़ी में केफ़ीन तत्व ज्यादा होता है जो गुर्दे के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। अत: इनका सर्वथा परित्याग चाहिए ।
         मूत्र प्रणाली में कोई भी संक्रामक रोग हो जाने से भी रक्तगत क्रिएटनीन बढ सकता है। अत: इस विषय में सावधानीपूर्वक इलाज करवाना चाहिये। उच्च रक्त चाप से गुर्दे को रक्त पहुंचाने वाली नलिकाओं को नुकसान होता है। इससे भी रक्त गत क्रिएटनीन बढ जाता है। अत: ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने के उपाय करना जरूरी है।
    नियमित २० मिनट व्यायाम करने और 3 किलोमिटर घूमने से खून में क्रिएटनीन की मात्रा काबू  करने  में मदद मिलती है। व्यायाम और घूमने के मामले में बिल्कुल  आलस्य न करें ।
   मधुमेह रोग धीरे -धीरे गुर्दे को नुकसान पहुंचाता रहता है। इसलिये यह रोग भी रक्तगत क्रिएटनीन को बढाने में अपनी भूमिका निर्वाह करता है। खून में शर्करा संतुलित बनाये रखने के उपाय करना आवश्यक हैं। 
       प्रोटीन हमारे शरीर के ऊतकों और मांसपेशियों के निर्माण में उपयोग होता है। इससे रोगों के विरुद्ध लडने में भी मदद मिलती है। जब प्रोटीन शारीरिक क्रियाओं के लिये टूटता है तो इससे यूरिया अपशिष्ट पदार्थ बनता है। अकर्मण्य अथवा क्षतिग्रस्त किडनी इस यूरिया को शरीर से बाहर नहीं निकाल पाती है। खून में यूरिया का स्तर बढने पर क्रिएटनीन भी बढेगा । मांस में और अंडों में किडनी के लिये सबसे ज्यादा हानिकारक प्रोटीन पाया जाता है। अत: किडनी रोगी को ये भोजन पदार्थ नहीं लेना चाहिये। प्रोटीन की पूर्ति हम थोडी मात्रा में दालो के माध्यम से कर सकते हैं।
   किडनी के सुचारु कार्य नहीं करने से खून में पोटेशियम का लेविल बहुत ज्यादा बढ जाता है। पोटेशियम की अधिकता से अचानक हार्ट अटैक होने की सम्भावना बढ जाती है। अगर लेबोरेटरी जांच में रक्त में पोटेशियम बढा हुआ पाया जाए तो कम पोटेशियम वाला खाना लेना चाहिये। खीरा ककडी,गाजर,सेव,अंगूर और चावल कम पोटेशियम वाले भोजन  पदार्थ हैं । केला,संतरा,आलू का उपयोग वर्जित है। इनमे अधिक पोटेशियम पाया जाता है। लेकिन अगर पोटेशियम वांछित स्तर का हो तो इन फ़लों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
   किडनी अकर्मण्यता एक मुश्किल से काबू में आने वाला रोग है । मेरे बताये उपायों पर पूरी सावधानी के साथ अमल करने से क्रिएटनीन लेविल में वांछित सुधार होगा और किडनी फ़ैलियर की स्थिति से निपटने में मदद मिलेगी।
वैद्य— एस0के0यादव

घर में लगाएं मधुमालती का पौधा


*मधुमालती एक बहुत ही सौम्य प्रकृति का पौधा है । लताएं कम भूमि और कम पानी में अधिक हरियाली प्रदान करती है व छाया देती है साथ ही रंग रंगीले फूलों से घर आंगन की शोभा भी बढ़ती है । इस कारण इन्हें घरों या कार्यालयों के प्रवेश स्थल, दीवारों के साथ— साथ या किनारों पर लगाना बहुत ही उपयोगी रहता है । मधुमालती एक ऐसी लता है जो साल भर हरी रहती है और इस पर लाल, गुलाबी व सफेद रंग के मिश्रित गुच्छों के रूप में फूल आते हैं जिनमें भीनी खुशबू होती है । इसकी डालियाँ नर्म होती है जिन्हें आसानी से काटा— छांटा जा सकता है । यह लता बहुत कम देख भाल मांगती है और एक बार जड़ पकड़ लेने के बाद पानी नहीं देने पर भी चलती रहती है ।
* लता न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण का काम करेगी, बल्कि घरों की खूबसूरती भी बढ़ाएगी । लताएं वातावरण से कार्बन डाई आॅक्साइड अवशोषित कर हमें आक्सीजन प्रदान करती ही है, इनके पत्ते अपनी सतह पर धूल कण रोक कर हवा में धूल के कणों की मात्रा भी कम करत हैं ।
* लताओं के पत्ते पानी को वाष्पोत्सर्जित करते है जिससे हवा का तापमान और सूखापन घटता है । लताएं घनी होती हैं, इस कारण दीवारों पर धूप की मार कम पड़ती है । नतीजा घरों का तापमान सामान्य बना रहता है । मधुमालती भी एक ऐसी ही लता है जो साल भर हरी रहती है और इसके फूलों के गुच्छों से भीनी भीनी खुशबू आती रहती है । मालती या मधुमालती के फूल बहुत सुन्दर होते है ।
* मधुमालती फूल के फूल और पत्तियों का रस मधुमेह के लिए बहुत अच्छा है ।
* इसके फूलों से आयुर्वेद में वसंत कुसुमाकर रस नाम की दवाई बनाई जाती है । इसकी 2-5 ग्राम की मात्रा लेने से कमजोरी दूर होती है और हारमोन ठीक हो जाते हैं ।
* प्रमेह, प्रदर, पेट दर्द, सर्दी जुकाम और मासिक धर्म आदि सभी समस्याओं का यह समाधान है । प्रमेह या प्रदर मे इसके 3-4 ग्राम फूलों का रस मिश्री के साथ लें ।
* शुगर की बीमारी में करेला, खीरा, टमाटर के साथ मालती के फूल डालकर जूस निकालें और सवेरे खाली पेट लें या केवल इसकी 5-6 पत्तियों का रस ही ले , वह भी काम करेगा ।
* मधुमालती की बेल कई घरों में लगी होंगी इसके फूल और पत्तियों का रस मधुमेह के लिए बहुत अच्छा है । इसके फूलों से आयुर्वेद में वसंत कुसुमाकर रस नाम की दवाई बनाई जाती है
* प्रमेह या प्रदर में इसके 3-4 ग्राम फूलों का रस मिश्री के साथ लें ।
* कमजोरी में भी इसकी पत्तियों और फूलों का रस ले सकते हैं ।
* पेट दर्द में इसके फूल और पत्तियों का रस लेने से पाचक रस बनने लगते हैं। इसे बच्चे भी आराम से ले सकते हैं।
* सर्दी ज़ुकाम के लिए इसकी एक ग्राम फूल पत्ती और एक ग्राम तुलसी का काढ़ा बनाकर पीयें । यह किसी भी तरह का नुकसान नहीं करता। यह बहुत सौम्य प्रकृति का पौधा है।
* पेट दर्द में इसके फूल और पत्तियों का रस लेने से पाचक रस बनने लगते हैं । सर्दी जुकाम के लिए इसकी एक ग्राम फूल पत्ती और एक ग्राम तुलसी का काढ़ा बनाकर पीयें ।
 वैद्य— एस0के0 यादव

स्वर भंग


* कच्चा सुंहागा आधा ग्राम (मटर के बराबर सुहागे को टुकड़ा) मुँह में रखें और रस चुसते रहें। उसके गल जाने के बाद स्वरभंग में तुरंत आराम हो जाता है। दो तीन घण्टों मे ही गला बिलकुल साफ हो जाता है। उपदेशकों और गायकों की बैठी हुई आवाज खोलने के लिये अत्युत्तम औषधि है।
* सोते समय एक ग्राम मुलहठी के चूर्ण को मुख में रखकर कुछ देर चबाते रहे। फिर वैसे ही मुँह में रखकर सो जाएं । प्रातः काल तक गला साफ हो जायेगा। मुलठी चुर्ण को पान के पत्ते में रखकर लिया जाय तो और भी उत्तम रहेगा। इससे प्रातः गला खुलने के अतिरिक्त गले का दर्द और सूजन भी दूर होती है।
* रात को सोते समय सात काली मिर्च और उतने ही बताशे चबाकर सो जायें। सर्दी जुकाम, स्वर भंग ठीक हो जाएगा। बताशे न मिलें तो काली मिर्च व मिश्री मुँह में रखकर धीरे-धीरे चुसते रहने से बैठा खुल जाता है।
* भोजन के पश्चात दस काली मिर्च का चुर्ण घी के साथ चाटें अथवा दस बताशे की चासनी में दस काली मिर्च का चुर्ण मिलाकर चाटें।
वैद्य एस0के0 यादव

सेक्स समस्याओं में सर्वश्रेष्ठ अलसी


* अलसी आपका हर्बल चिकित्सक है यह आपकी सारी सेक्स सम्बंधी समस्याएं  दुरुस्त कर देगा क्योंकि अलसी आधुनिक युग में स्तंभनदोष के साथ— साथ शीघ्रस्खलन, दुर्बल कामेच्छा, बांझपन, गर्भपात, दुग्धअल्पता की भी महान औषधि है।
* सेक्स संबन्धी समस्याओं के अन्य सभी उपचारों से सर्वश्रेष्ठ और सुरक्षित है अलसी। बस 30 ग्राम रोज लेनी है।
* सबसे पहले तो अलसी आप और आपके जीवनसाथी की त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनायेगी। आपके केश काले, घने, मजबूत, चमकदार और रेशमी हो जायेंगे।
* अलसी आपकी देह को ऊर्जावान, बलवान और मांसल बना देगी। शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी गहेगी, न क्रोध आयेगा और न कभी थकावट होगी। मन शांत, सकारात्मक और दिव्य हो जायेगा।
* अलसी में विद्यमान ओमेगा-3 फैट, जिंक और मेगनीशियम आपके शरीर में पर्याप्त टेस्टोस्टिरोन हार्मोन और उत्कृष्ट श्रेणी के फेरोमोन ( आकर्षण के हार्मोन) स्रावित होंगे। टेस्टोस्टिरोन से आपकी कामेच्छा चरम स्तर पर होगी। आपके साथी से आपका प्रेम, अनुराग और परस्पर आकर्षण बढ़ेगा। आपका मनभावन व्यक्तित्व, मादक मुस्कान और षटबंध उदर देख कर आपके साथी की कामाग्नि भी भड़क उठेगी।
* अलसी में विद्यमान ओमेगा-3 फैट, आर्जिनीन एवं लिगनेन जननेन्द्रियों में रक्त के प्रवाह को बढ़ाती हैं, जिससे शक्तिशाली स्तंभन तो होता ही है साथ ही उत्कृष्ट और गतिशील शुक्राणुओं का निर्माण होता है। इसके अलावा ये शिथिल पड़ी क्षतिग्रस्त नाड़ियों का कायाकल्प करते हैं जिससे सूचनाओं एवं संवेदनाओं का प्रवाह दुरुस्त हो जाता है।
* नाड़ियों को स्वस्थ रखने में अलसी में विद्यमान लेसीथिन, विटामिन बी ग्रुप, बीटा केरोटीन, फोलेट, कॉपर आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ओमेगा-3 फैट के अलावा सेलेनियम और जिंक प्रोस्टेट के रखरखाव, स्खलन पर नियंत्रण, टेस्टोस्टिरोन और शुक्राणुओं के निर्माण के लिए बहुत आवश्यक हैं। कुछ वैज्ञानिकों के मतानुसार अलसी लिंग की लंबाई और मोटाई भी बढ़ाती है।
* अलसी के सेवन जबर्दस्त अश्वतुल्य स्तंभन होता है, जब तक मन न भरे सम्भोग का दौर चलता है, देह के सारे चक्र खुल जाते हैं, पूरे शरीर में दैविक ऊर्जा का प्रवाह होता है और सम्भोग एक यांत्रिक क्रीड़ा न रह कर एक आध्यात्मिक उत्सव बन जाता है, समाधि का रूप बन जाता है।
अलसी सेवन का तरीकाः-
* हमें प्रतिदिन 30 – 60 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। 30 ग्राम आदर्श मात्रा है। अलसी को रोज मिक्सी के ड्राई ग्राइंडर में पीसकर आटे में मिलाकर रोटी, पराँठा आदि बनाकर खाना चाहिये। डायबिटीज के रोगी सुबह शाम अलसी की रोटी खायें। कैंसर में बुडविग आहार-विहार की पालना पूरी श्रद्धा और पूर्णता से करना चाहिये। इससे ब्रेड, केक, कुकीज, आइसक्रीम, चटनियाँ, लड्डू आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाये जाते हैं।
* दूसरा एक तरीका है कि आप अलसी को सूखी कढ़ाई में डालिये, रोस्ट कीजिये (अलसी रोस्ट करते समय चट चट की आवाज करती है) और मिक्सी से पीस लीजिये, इन्हें थोड़े दरदरे पीसिये, एकदम बारीक मत कीजिये। भोजन के बाद सौंफ की तरह इसे खाया जा सकता है। लेकिन आप इसे जादा मात्रा में बना के न रक्खे क्युंकि ये खराब हो जाती है। एक हफ्ते के लिए बनाना ही चाहिए। अलसी आपको अनाज बेचने वाले तथा पंसारी या आयुर्वेदिक जड़ी बूटी बेचने वालो के यहाँ से मिल जायेगी।
* अलसी की पुल्टिस का प्रयोग गले एवं छाती के दर्द, सूजन तथा निमोनिया और पसलियों के दर्द में लगाकर किया जाता है। इसके साथ यह चोट, मोच, जोड़ों की सूजन, शरीर में कहीं गांठ या फोड़ा उठने पर लगाने से शीघ्र लाभ पहुंचाती है। यह श्वास नलियों और फेफड़ों में जमे कफ को निकाल कर दमा और खांसी में राहत देती है।
* इसकी बड़ी मात्रा विरेचक तथा छोटी मात्रा गुर्दो को उत्तेजना प्रदान कर मूत्र निष्कासक है।
* यह पथरी, मूत्र शर्करा और कष्ट से मूत्र आने पर गुणकारी है।
* अलसी के तेल का धुआं सूंघने से नाक में जमा कफ निकल आता है और पुराने जुकाम में लाभ होता है। यह धुआं हिस्टीरिया रोग में भी गुण दर्शाता है।
* अलसी के काढ़े से एनिमा देकर मलाशय की शुद्धि की जाती है। उदर रोगों में इसका तेल पिलाया जाता हैं।
* पथरी, सुजाक एवं पेशाब की जलन में अलसी का फांट पीने से रोग में लाभ मिलता है। अलसी के कोल्हू से दबाकर निकाले गए (कोल्ड प्रोसेस्ड) तेल को फ्रिज में एयर टाइट बोतल में रखें। स्नायु रोगों, कमर एवं घुटनों के दर्द में यह तेल पंद्रह मि.ली. मात्रा में सुबह-शाम पीने से काफी लाभ मिलेगा।
* इसी कार्य के लिए इसके बीजों का ताजा चूर्ण भी दस-दस ग्राम की मात्रा में दूध के साथ प्रयोग में लिया जा सकता है। यह नाश्ते के साथ लें।
* बवासीर, भगदर, फिशर आदि रोगों में अलसी का तेल (एरंडी के तेल की तरह) लेने से पेट साफ हो मल चिकना और ढीला निकलता है। इससे इन रोगों की वेदना शांत होती है।
* अलसी के बीजों का मिक्सी में बनाया गया दरदरा चूर्ण पंद्रह ग्राम, मुलेठी पांच ग्राम, मिश्री बीस ग्राम, आधे नींबू के रस को उबलते हुए तीन सौ ग्राम पानी में डालकर बर्तन को ढक दें। तीन घंटे बाद छानकर पीएं। इससे गले व श्वास नली का कफ पिघल कर जल्दी बाहर निकल जाएगा। मूत्र भी खुलकर आने लगेगा।
* इसकी पुल्टिस हल्की गर्म कर फोड़ा, गांठ, गठिया, संधिवात, सूजन आदि में लाभ मिलता है।
* डायबिटीज के रोगी को कम शर्करा व ज्यादा फाइबर खाने की सलाह दी जाती है। अलसी व गैहूं के मिश्रित आटे में (जहां अलसी और गैहूं बराबर मात्रा में हो)
* अलसी बांझपन, पुरूषहीनता, शीघ्रस्खलन व स्थम्भन दोष में बहुत लाभदायक है।
* कई असाध्य रोग जैसे अस्थमा, एल्ज़ीमर्स, मल्टीपल स्कीरोसिस, डिप्रेशन, पार्किनसन्स, ल्यूपस नेफ्राइटिस, एड्स, स्वाइन फ्लू आदि का भी उपचार करती है अलसी। कभी-कभी चश्में से भी मुक्ति दिला देती है अलसी। दृष्टि को स्पष्ट और सतरंगी बना देती है अलसी।
* जोड़ की हर तकलीफ का तोड़ है अलसी। जॉइन्ट रिप्लेसमेन्ट सर्जरी का सस्ता और बढ़िया उपचार है अलसी। ­­ आर्थ्राइटिस, शियेटिका, ल्युपस, गाउट, ओस्टियोआर्थ्राइटिस आदि का उपचार है अलसी।
* लिगनेन का सबसे बड़ा स्रोत अलसी ही है जो जीवाणुरोधी, विषाणुरोधी, फफूंदरोधी और कैंसररोधी है। अलसी शरीर की रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ कर शरीर को बाहरी संक्रमण या आघात से लड़ने में मदद करती हैं और शक्तिशाली एंटी-आक्सीडेंट है।
* लिगनेन वनस्पति जगत में पाये जाने वाला एक उभरता हुआ सात सितारा पोषक तत्व है जो स्त्री हार्मोन ईस्ट्रोजन का वानस्पतिक प्रतिरूप है और नारी जीवन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे रजस्वला, गर्भावस्था, प्रसव, मातृत्व और रजोनिवृत्ति में विभिन्न हार्मोन्स् का समुचित संतुलन रखता है। लिगनेन मासिकधर्म को नियमित और संतुलित रखता है। लिगनेन रजोनिवृत्ति जनित-कष्ट और अभ्यस्त गर्भपात का प्राकृतिक उपचार है। लिगनेन दुग्धवर्धक है। लिगनेन स्तन, बच्चेदानी, आंत, प्रोस्टेट, त्वचा व अन्य सभी कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू तथा एंलार्ज प्रोस्टेट आदि बीमारियों से बचाव व उपचार करता है।
* त्वचा, केश और नाखुनों का नवीनीकरण या जीर्णोद्धार करती है अलसी। अलसी के शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट ओमेगा-3 व लिगनेन त्वचा के कोलेजन की रक्षा करते हैं और त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनाते हैं। अलसी सुरक्षित, स्थाई और उत्कृष्ट भोज्य सौंदर्य प्रसाधन है जो त्वचा में अंदर से निखार लाता है। त्वचा, केश और नाखून के हर रोग जैसे मुहांसे, एग्ज़ीमा, दाद, खाज, खुजली, सूखी त्वचा, सोरायसिस, ल्यूपस, डेन्ड्रफ, बालों का सूखा, पतला या दोमुंहा होना, बाल झड़ना आदि का उपचार है अलसी। चिर यौवन का स्रोत है अलसी। बालों का काला हो जाना या नये बाल आ जाना जैसे चमत्कार भी कर देती है अलसी। किशोरावस्था में अलसी के सेवन करने से कद बढ़ता है।
* अलसी एक फीलगुड फूड है, क्योंकि अलसी से मन प्रसन्न रहता है, झुंझलाहट या क्रोध नहीं आता है, पॉजिटिव एटिट्यूड बना रहता है यह आपके तन, मन और आत्मा को शांत और सौम्य कर देती है। अलसी के सेवन से मनुष्य लालच, ईर्ष्या, द्वेश और अहंकार छोड़ देता है। इच्छाशक्ति, धैर्य, विवेकशीलता बढ़ने लगती है, पूर्वाभास जैसी शक्तियाँ विकसित होने लगती हैं। इसीलिए अलसी देवताओं का प्रिय भोजन थी। यह एक प्राकृतिक वातानुकूलित भोजन है।
* अलसी कॉलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और हृदयगति को सही रखती है। रक्त को पतला बनाये रखती है अलसी। रक्तवाहिकाओं को साफ करती रहती है अलसी।
* अलसी शर्करा ही नियंत्रित नहीं रखती, बल्कि मधुमेह के दुष्प्रभावों से सुरक्षा और उपचार भी करती है। अलसी में रेशे भरपूर 27 प्रतिशत पर शर्करा 1.8 प्रतिशत  यानी नगण्य होती है। इसलिए यह शून्य-शर्करा आहार कहलाती है और मधुमेह के लिए आदर्श आहार है। अलसी खाने की ललक कम करती है, चर्बी कम करती है, शक्ति व स्टेमिना बढ़ाती है, आलस्य दूर करती है और वजन कम करने में सहायता करती है। चूँकि ओमेगा-3 और प्रोटीन मांस-पेशियों का विकास करते हैं अतः बॉडी बिल्डिंग के लिये भी नम्बर वन सप्लीमेन्ट है अलसी।
* आयुर्वेद के अनुसार हर रोग की जड़ पेट है और पेट साफ रखने में यह इसबगोल से भी ज्यादा प्रभावशाली है। अल्सरेटिव कोलाइटिस, अपच, बवासीर, मस्से आदि का भी उपचार करती है अलसी।
* ओमेगा-3 हमारे शरीर की सारी कोशिकाओं, उनके न्युक्लियस, माइटोकोन्ड्रिया आदि संरचनाओं के बाहरी खोल या झिल्लियों का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यही इन झिल्लियों को वांछित तरलता, कोमलता और पारगम्यता प्रदान करता है।
* फिर क्या सोच रहे है आज ही अपनाए और देखे इसके फायदे ....गर्मी में आप इसकी मात्रा आधी कर ले सिर्फ 15 ग्राम ही सेवन करे।
 वैद्य एस0के0 यादव

बडे कमाल की है फिटकरी


फिटकरी को लोग सालों से काम में लेते आए हैं। फिटकरी आमतौर पर सब घरों में प्रयोग होती है। यह लाल व सफेद दो प्रकार की होती है। अधिकतर सफेद फिटकरी का प्रयोग ही किया जाता है।
जानिए फिटकरी के ‪‎गुण‬:-
* जिन लोगो को शरीर से ज्यादा ‪पसीना‬ आने की समस्या हो तो वो लोग नहाते समय पानी में फिटकरी को घोलकर नहाने से पसीना आना कम हो जाता है।
* फिटकरी के पानी से ‪योनि‬ को सुबह-शाम नियमित धोएं। पंसारी से संगे जराहत और फिटकरी लेकर दोनों पीस लें और इस आधा ग्राम चूर्ण की फंकी ताजे पानी के साथ या गाय के दूध के साथ सुबह, दोपहर और शाम दिन में तीन बार लें। कुछ ही दिनों के प्रयोग से अवश्य लाभ होगा।
* सर्दियों के समय में पानी में ज्यादा काम करने से हाथों की उंगुलियों में सूजन या खुजली हो जाती है इससे बचने के लिए हो थोड़े पानी में फिटकरी को डालकर उबाल लें और अब इस पानी से उंगुलियों को धोने से ‪‎सूजन‬ और खुजली में काफी आराम मिल जाता है।
* यदि चोट या खरोंच लगकर घाव हो गया हो और उससे खून बह रहा हो घाव को फिटकरी के पानी से धोएं तथा घाव पर फिटकरी का चूर्ण बनाकर बुरकने से ‪खून‬ बहना बंद हो जाता है।
* फिटकरी और काली मिर्च पीसकर दांतों की जड़ों में मलने से ‪दांतों‬ की पीड़ा में लाभ होते है।
* सेविंग करने के बाद चेहरे पर फिटकरी लगाने से ‪चेहरा‬ मुलायम हो जाता है।
* आधा ग्राम पिसी हुई फिटकरी को शहद में मिलाकर चाटने से ‪दमा‬ और खांसी में बहुत लाभ मिलता है।
* भुनी हुई फिटकरी 1-1 ग्राम सुबह-शाम पानी के साथ लेने से खून की उल्टी बंद हो जाती है।
* दांत दर्द से बचने के लिए फिटकरी और काली मिर्च को पीसकर दांतों की जड़ों में मलने से दांतों का दर्द ठीक हो जाता है।
* फुलाई हुई फिटकरी एक तोला और मिश्री दो तोला दोनों को महीन पीसकर रख लें। एक-एक माशा नित्य सवेरे खाने से दमा के रोग में लाभ होता है।
* प्रतिदिन दोनों समय फिटकरी को गर्म पानी में घोलकर कुल्ला करें ,इससे दांतों के ‪कीड़े‬ तथा मुंह की बदबू दूर हो जाती है ।
* डेढ़ ग्राम फिटकरी पाउडर को फांककर ऊपर से दूध पीने से चोट लगने से होने वाला ‪दर्द‬ दूर हो होता हैं।
* टांसिल‬ की समस्या होने पर गर्म पानी में चुटकी भर फिटकरी और नमक डालकर गरारे करें। इससे टांसिल की समस्या में जल्दी ही आराम मिल जाता है।
* एक लीटर पानी में 10 ग्राम फिटकरी का चूर्ण घोल लें। इस घोल से प्रतिदिन सिर धोने से ‪जुएं‬ मर जाती हैं।
* दस ग्राम फिटकरी के चूर्ण में पांच ग्राम सेंधा नमक मिलाकर मंजन बना लें। इस मंजन के प्रतिदिन प्रयोग से ‪दांतो‬ के दर्द में आराम मिलता है ।
* ‪खुजली‬ वाली जगह को फिटकरी वाले पानी से धोएं और बाद में उस जगह पर थोड़ा-सा कड़वा तेल लगा लें। उस पर थोड़ा-सा कपूर भी डाल लें।
* एक लीटर पानी में बीस ग्राम फिटकरी को  घोल के दिन में दो या तीन बार सफ़ेद पानी की शिकायत होने पर गुप्तांग को घोने से एवं एक ग्राम फिटकरी को एक पके केले में चीर  भर के सात दिन खाने से आराम होता है।
  वैद्य एस0के0 यादव

एसीडीटी



                                                                    अति अम्लता                                                        
 आहार नली के ऊपरी हिस्से में अत्यधिक अम्लीय द्रव संचरित होने से खट्टापन और जलन का अनुभव होना ही एसिडिटी कहलाता है। जिससे मुहं में भी जलन और अम्लीयता आ जाती है।
आमाशयिक रस में अधिक हायड्रोक्लोरिक एसिड होने से यह स्थिति निर्मित होती है।
   आमाशय सामान्यत: भोजन पचाने हेतु जठर रस का निर्माण करता है। लेकिन जब आमाशयिक ग्रंथि से अधिक मात्रा में जठर रस बनने लगता है तब हायडोक्लोरिक एसिड की अधिकता से एसिडिटी की समस्या पैदा हो जाती है। बदहजमी,सीने में जलन और आमाशय में छाले इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।
  एसिडिटी के प्रमुख कारण निम्न हैं-
अधिक शराब का सेवन करना, अधिक मिर्च-मसालेदार भोजन-वस्तुएं उपयोग करना,मांसाहार,
कुछ अंग्रेजी दर्द निवारक गोलियां भी एसिडिटी रोग उत्पन्न करती हैं।
भोजन के बाद अम्लता के लक्षण बढ जाते हैं। तथा रात में लेटने पर भी एसिडिटी के लक्षण उग्र हो जाते हैं।
 निम्न  घरेलू पदार्थों से एसिडिटी का ईलाज निरापद और हितकारी होता है।
१) शाह जीरा  अम्लता निवारक होता है। डेढ लिटर पानी में २ चम्मच शाह जीरा डालें । १०-१५ मिनिट उबालें। यह काढा मामूली गरम हालत में  दिन में ३ बार पीयें। एक हफ़्ते के प्रयोग से एसिडीटी नियंत्रित हो जाती है।
२) भोजन पश्चात थोडे से बिना मसाले का गुड की डली मुहं में रखकर चूसें। हितकारी उपाय है।
३) सुबह उठकर  २-३ गिलास पानी पीयें। आप देखेंगे कि इस उपाय से अम्लता निवारण में बडी मदद मिलती है।
४) तुलसी के दो चार पत्ते दिन में कई बार चबाकर खाने से अम्लता में लाभ होता है।
५)  एक गिलास जल में २ चम्मच सौंफ़ डालकर उबालें। रात भर रखे। सुबह छानकर उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर पीयें। एसिडीटी नियंत्रण का उत्तम उपचार है।
७) आंवला एक ऐसा फ़ल जिससे शरीर के अनेकों रोग नष्ट होते हैं। एसिडीटी निवारण हेतु आंवला क उपयोग करना उत्तम फ़लदायी है।
८)  पुदिने का रस और पुदिने का तेल पेट की गैस और अम्लता निवारक कुदरती पदार्थ है। इसके कैप्सूल भी मिलते हैं।
९)  फ़लों का उपयोग अम्लता निवारंण में महती गुणकारी है। खासकर केला,तरबूज,ककडी और पपीता बहुत फ़ायदेमंद हैं।
१०)  ५ ग्राम लौंग और ३ ग्राम ईलायची का पावडर बना लें। भोजन पश्चात चुटकी भर पावडर मुंह में रखकर चूसें। मुंह की बदबू भी दूर होगी और अम्लता में भी लाभ होगा।
११) दूध और दूध से बने पदार्थ अम्लता नाशक माने गये हैं।
१२) अचार,सिरका,तला हुआ भोजन,मिर्च-मसालेदार चीजों का परहेज करें। इनसे अम्लता बढती है। चाय,काफ़ी और अधिक बीडी,सिगरेट उपयोग करने से एसिडिटी की समस्या पैदा होती है। छोडने का प्रयास करें।
१३) एक गिलास पानी में एक नींबू निचोडें। भोजन के बीच-बीच में नींबू पानी पीते रहें। एसिडिटी का समाधान होगा।
१४)  आधा गिलास मट्ठा( छाछ) में १५ मिलि हरा धनिये का रस मिलाकर  पीने से बदहजमी ,अम्लता, सीने मे जलन का निवारन होता है।
१५) सुबह-शाम २-३ किलोमिटर घूमने से तन्दुरस्ती ठीक रहती है और इससे अम्लता की समस्या से निपटने में भी मदद मिलती है।
                                                                                             वैद्य एस0के0यादव

Thursday, April 16, 2015

क्या है स्वास्थ्य की परिभाषा


विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सन १९४८ में स्वास्थ्य या आरोग्य की निम्नलिखित परिभाषा की—
दैहिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना अर्थात (समस्या-विहीन होना)
स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों की अनुपस्थिति का ही नाम नहीं है। हमें सर्वांगीण स्वास्थ्य के बारे में अवश्य जानकारी होनी चाहिए। स्वास्थ्य का अर्थ विभिन्न लोगों के लिए अलग-अलग हो सकता है। लेकिन अगर हम एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण की बात करें तो अपने आपको स्वस्थ कहने का यह अर्थ होता है कि हम अपने जीवन में आनेवाली सभी सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियों का प्रबंधन करने में सफलतापूर्वक सक्षम हो, वैसे तो अपने आपको स्वस्थ रखने के ढेर सारी आधुनिक तकनीक मौजूद है लेकिन ये सारे उतने अधिक कारगर नहीं है।
समग्र स्वास्थ्य की परिभाषा
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, स्वास्थ्य सिर्फ रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति ही नहीं बल्कि एक पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक खुशहाली की स्थिति है। स्वस्थ लोग रोजमर्रा की गतिविधियों से निपटने के लिए और किसी भी परिवेश के मुताबिक अपना अनुकूलन करने में सक्षम होते हैं। रोग की अनुपस्थिति एक वांछनीय स्थिति है लेकिन यह स्वास्थ्य को पूर्णतया परिभाषित नहीं करता है। यह स्वास्थ्य के लिए एक कसौटी नहीं है और इसे अकेले स्वास्थ्य निर्माण के लिए पर्याप्त भी नहीं माना जा सकता है। लेकिन स्वस्थ होने का वास्तविक अर्थ अपने आप पर ध्यान केंद्रित करते हुए जीवन जीने के स्वस्थ तरीकों को अपनाया जाना है।
यदि हम एक अभिन्न व्यक्तित्व की इच्छा रखते हैं तो हमें हमेशा खुश रहना चाहिए और मन में इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि स्वास्थ्य के आयाम अलग— अलग टुकड़ों की तरह है। अतः अगर हम वास्तव में अपने जीवन को कोई अर्थ प्रदान करना चाहते हैं तो हमें स्वास्थ्य के इन विभिन्न आयामों को एक साथ फिट करना पड़ेगा। वास्तव में, अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना समग्र स्वास्थ्य का नाम है, जिसमें शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, बौद्धिक स्वास्थ्य, आध्यात्मिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्वास्थ्य भी शामिल है।
शारीरिक स्वास्थ्य
शारीरिक स्वास्थ्य व्यक्ति की शरीर की स्थिति को दर्शाता है जिसमें इसकी संरचना, विकास, कार्यप्रणाली और रखरखाव शामिल होता है। यह एक व्यक्ति की सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक सामान्य स्थिति है। यह एक जीव के कार्यात्मक और/या चयापचय क्षमता का एक स्तर भी है। अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के निम्नलिखित कुछ तरीके हैं-
1 संतुलित आहार की आदतें, मीठी श्वास व गहरी नींद
2 बड़ी आंत की नियमित गतिविधि व संतुलित शारीरिक गतिविधियां
3 नाड़ी स्पंदन, रक्तदाब, शरीर का भार व व्यायाम सहनशीलता आदि सब कुछ व्यक्ति के आकार, आयु व लिंग के लिए सामान्य मानकों के अनुसार होना चाहिए।
4 शरीर के सभी अंग सामान्य आकार के हों तथा उचित रूप से कार्य कर रहे हों।
मानसिक स्वास्थ्य
मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ हमारे भावनात्मक और आध्यात्मिक लचीलेपन से है जो हमें अपने जीवन में दर्द, निराशा और उदासी की स्थितियों में जीवित रहने के लिए सक्षम बनाती है। मानसिक स्वास्थ्य हमारी भावनाओं को व्यक्त करने और जीवन की ढ़ेर सारी माँगों के प्रति अनुकूलन की क्षमता है। इसे अच्छा बनाए रखने के निम्नलिखित कुछ तरीके हैं-
1 प्रसन्नता, शांति व व्यवहार में प्रफुल्लता
2 आत्म-संतुष्टि (आत्म-भर्त्सना या आत्म-दया की स्थिति न हो।)
3 भीतर ही भीतर कोई भावात्मक संघर्ष न हो (सदैव स्वयं से युद्धरत होने का भाव न हो।)
4 मन की संतुलित अवस्था।
बौद्धिक स्वास्थ्य
यह किसी के भी जीवन को बढ़ाने के लिए कौशल और ज्ञान को विकसित करने के लिए संज्ञानात्मक क्षमता है। हमारी बौद्धिक क्षमता हमारी रचनात्मकता को प्रोत्साहित और हमारे निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करने में मदद करता है।
1 समायोजन करने वाली बुद्धि, आलोचना को स्वीकार कर सके व आसानी से व्यथित न हो।
2 दूसरों की भावात्मक आवश्यकताओं की समझ, सभी प्रकार के व्यवहारों में शिष्ट रहना व दूसरों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना, नए विचारों के लिए खुलापन, उच्च भावात्मक बुद्धि।
3 आत्म-संयम, भय, क्रोध, मोह, जलन, अपराधबोध या चिंता के वश में न हो। लोभ के वश में न हो तथा समस्याओं का सामना करने व उनका बौद्धिक समाधान तलाशने में निपुण हो।
आध्यात्मिक स्वास्थ्य
हमारा अच्छा स्वास्थ्य आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ हुए बिना अधूरा है। जीवन के अर्थ और उद्देश्य की तलाश करना हमें आध्यात्मिक बनाता है। आध्यात्मिक स्वास्थ्य हमारे निजी मान्यताओं और मूल्यों को दर्शाता है। अच्छे आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने का कोई निर्धारित तरीका नहीं है। यह हमारे अस्तित्व की समझ के बारे में अपने अंदर गहराई से देखने का एक तरीका है।
1 समुचित ज्ञान की प्राप्ति तथा स्वयं को एक आत्मा के रूप में जानने का निरंतर बोध। सुप्रीम डॉक्टर के निरंतर संपर्क में रहना। स्वयं को जानने व अनुभव करने वाली आत्मा सदैव शांत व पवित्र होगी।
2 अपने शरीर सहित इस भौतिक जगत की किसी भी वस्तु से मोह न रखना। दूसरी आत्माओं के प्रभाव में आए बिना उनसे भाईचारे का नाता रखना। इस प्रकार एक व्यक्ति के कर्म उन्नत होंगे तथा उच्चस्तरीय व विशिष्ट हो पाएंगे।
3 सुप्रीम डॉक्टर या सर्वोच्च आत्मा से निरंतर बौद्धिक संप्रेषण ताकि सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त कर विशुद्ध कर्म की ओर प्रेषित की जा सके। आत्मा स्वयं को तथा दूसरों को विनीत, अनश्वर तथा दुर्गुणरहित पाएगी। उसे कोई भी सांसारिक बाधा त्रस्त नहीं कर सकती।
सामाजिक स्वास्थ्य
चूँकि हम सामाजिक जीव हैं अतः संतोषजनक रिश्ते का निमार्ण करना और उसे बनाए रखना हमें स्वाभाविक रूप से आता है। सामाजिक रूप से सबके द्वारा स्वीकार किया जाना हमारे भावनात्मक खुशहाली के लिए अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
(1) ऐसी मित्रता करें जो संतोषप्रद व दीर्घकालिक हो।
(2) परिवार व समाज से जुड़े संबंधों को हार्दिक व अक्षुण्ण बनाए रखें
(3) अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार समाज के कल्याण के लिए कार्य करना।
अधिकांश लोग अच्छे स्वास्थ्य के महत्त्व को नहीं समझते हैं और अगर समझते भी हैं तो वे अभी तक इसकी उपेक्षा कर रहे हैं। हम जब भी स्वास्थ्य की बात करते हैं तो हमारा ध्यान शारीरिक स्वास्थ्य तक ही सीमित रहता है। हम बाकी आयामों के बारे में नहीं सोचते हैं। अच्छे स्वास्थ्य की आवश्यकता हम सबको है। यह किसी एक विशेष धर्म, जाति, संप्रदाय या लिंग तक सीमित नहीं है। अतः हमें इस आवश्यक वस्तु के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। अधिकांश रोगों का मूल हमारे मन में होता है। एक व्यक्ति को स्वस्थ तब कहा जाता है जब उसका शरीर स्वस्थ और मन साफ और शांत हो। कुछ लोगों के पास भौतिक साधनों की कमी नहीं होती है फिर भी वे दुःखी या मनोवैज्ञानिक स्तर पर उत्तेजित हो सकते।
आयुर्वेद मे स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा इस प्रकार बताई है-
समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियाः ।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थः इत्यभिधीयते ॥
( जिस व्यक्ति के दोष (वात, कफ और पित्त) समान हों, अग्नि सम हो, सात धातुयें भी सम हों, तथा मल भी सम हो, शरीर की सभी क्रियायें समान क्रिया करें, इसके अलावा मन, सभी इंद्रियाँ तथा आत्मा प्रसन्न हो, वह मनुस्य स्वस्थ कहलाता है )। यहाँ 'सम' का अर्थ 'संतुलित' ( न बहुत अधिक न बहुत कम) है।
स्वास्थ्य की आयुर्वेद सम्मत अवधारणा बहुत व्यापक है। आयुर्वेद में स्वास्थ्य की अवस्था को प्रकृति (प्रकृति अथवा मानवीय गठन में प्राकृतिक सामंजस्य) और अस्वास्थ्य या रोग की अवस्था को विकृति (प्राकृतिक सामंजस्य से बिगाड़) कहा जाता है। चिकित्सक का कार्य रोगात्मक चक्र में हस्तक्षेप करके प्राकृतिक सन्तुलन को कायम करना और उचित आहार और औषधि की सहायता से स्वास्थ्य प्रक्रिया को दुबारा शुरू करना है। औषधि का कार्य खोए हुए सन्तुलन को फिर से प्राप्त करने के लिए प्रकृति की सहायता करना है। आयुर्वेदिक मनीषियों के अनुसार उपचार स्वयं प्रकृति से प्रभावित होता है, चिकित्सक और औषधि इस प्रक्रिया में सहायता-भर करते हैं।
स्वास्थ्य के नियम आधारभूत ब्रह्मांडीय एकता पर निर्भर है। ब्रह्मांड एक सक्रिय इकाई है, जहाँ प्रत्येक वस्तु निरन्तर परिवर्तित होती रहती है, कुछ भी अकारण और अकस्मात् नहीं होता और प्रत्येक कार्य का प्रयोजन और उद्देश्य हुआ करता है। स्वास्थ्य को व्यक्ति के स्वयं और उसके परिवेश से तालमेल के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। विकृति या रोग होने का कारण व्यक्ति के स्वयं का ब्रह्मांड के नियमों से ताल-मेल न होना है।
आयुर्वेद का कर्तव्य है, देह का प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखना और शेष विश्व से उसका ताल-मेल बनाना। रोग की अवस्था में, इसका कर्तव्य उपतन्त्रों के विकास को रोकने के लिए शीघ्र हस्तक्षेप करना और देह के सन्तुलन को पुन: संचित करना है। प्रारम्भिक अवस्था में रोग सम्बन्धी तत्त्व अस्थायी होते हैं और साधारण अभ्यास से प्राकृतिक सन्तुलन को फिर से कायम किया जा सकता है।
यह सम्भव है कि आप स्वयं को स्वस्थ समझते हों, क्योंकि आपका शारीरिक रचनातन्त्र ठीक ढंग से कार्य करता है, फिर भी आप विकृति की अवस्था में हो सकते हैं अगर आप असन्तुष्ट हों, शीघ्र क्रोधित हो जाते हों, चिड़चिड़ापन या बेचैनी महसूस करते हों, गहरी नींद न ले पाते हों, आसानी से फारिग न हो पाते हों, उबासियाँ बहुत आती हों, या लगातार हिचकियाँ आती हो, इत्यादि।
स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में पंच महाभूत, आयु, बल एवं प्रकृति के अनुसार योग्य मात्रा में रहते हैं। इससे पाचन क्रिया ठीक प्रकार से कार्य करती है। आहार का पाचन होता है और रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सातों धातुओं का निर्माण ठीक प्रकार से होता है। इससे मल, मूत्र और स्वेद का निर्हरण भी ठीक प्रकार से होता है।
स्वास्थ्य की रक्षा करने के उपाय बताते हुए आयुर्वेद कहता है-
त्रय उपस्तम्भा: आहार: स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति (चरक संहिता सूत्र. 11/35)
अर्थात् शरीर और स्वास्थ्य को स्थिर, सुदृढ़ और उत्तम बनाये रखने के लिए आहार, स्वप्न (निद्रा) और ब्रह्मचर्य - ये तीन उपस्तम्भ हैं। ‘उप’ यानी सहायक और ‘स्तम्भ’ यानी खम्भा। इन तीनों उप स्तम्भों का यथा विधि सेवन करने से ही शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा होती है।
इसी के साथ शरीर को बीमार करने वाले कारणों की भी चर्चा की गई है यथा-
धी धृति स्मृति विभ्रष्ट: कर्मयत् कुरुतशुभम्।
प्रज्ञापराधं तं विद्यातं सर्वदोष प्रकोपणम्॥ -- (चरक संहिता; शरीर. 1/102)
अर्थात् धी (बुद्धि), धृति (धारण करने की क्रिया, गुण या शक्ति/धैर्य) और स्मृति (स्मरण शक्ति) के भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य जब अशुभ कर्म करता है तब सभी शारीरिक और मानसिक दोष प्रकुपित हो जाते हैं। इन अशुभ कर्मों को प्रज्ञापराध कहा जाता है। जो प्रज्ञापराध करेगा उसके शरीर और स्वास्थ्य की हानि होगी और वह रोगग्रस्त हो ही जाएगा।
स्वास्थ्य का आधुनिक दृष्टिकोण
स्वास्थ्य की देखभाल का आधुनिक दृष्टिकोण आयुर्वेद के समग्र दृष्टिकोण के विपरीत है, अलग-अलग नियमों पर आधारित है और पूरी तरह से विभाजित है। इसमें मानव-शरीर की तुलना एक ऐसी मशीन के रूप में की गई है, जिसके अलग-अलग भागों का विश्लेषण किया जा सकता है। रोग को शरीर रूपी मशीन के किसी पुरजे में खराबी के तौर पर देखा जाता है। देह की विभिन्न प्रक्रियाओं को जैविकीय और आणविक स्तरों पर समझा जाता है और उपचार के लिए, देह और मानस को दो अलग-अलग सत्ता के रूप में देखा जाता है।
                                                                                                        वैद्य एस0के0यादव

Friday, April 10, 2015

शूकर इन्फ्लूएंजा

शूकर इन्फ्लूएंजा, जिसे एच1एन1 या स्वाइन फ्लू भी कहते हैं, विभिन्न शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणुओं मे से किसी एक के द्वारा फैलाया गया संक्रमण है। शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणु (SIV-एस.आई.वी), इन्फ्लूएंजा कुल के विषाणुओं का वह कोई भी उपभेद है, जो कि सूअरों की स्थानिकमारी के लिए उत्तरदायी है। 2009 तक ज्ञात एस.आई.वी उपभेदों में इन्फ्लूएंजा सी और इन्फ्लूएंजा ए के उपप्रकार एच1एन1 (H1N1), एच1एन2 (H1N2), एच3एन1 (H3N1), एच3एन2 (H3N2) और एच2एन3 (H2N3) शामिल हैं। इस प्रकार का इन्फ्लूएंजा मनुष्यों और पक्षियों पर भी प्रभाव डालता है। शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणु का दुनिया भर के सुअरो मे पाया जाना आम है। इस विषाणु का सूअरों से मनुष्य मे संचरण आम नहीं है और हमेशा ही यह विषाणु मानव इन्फ्लूएंजा का कारण नहीं बनता, अक्सर रक्त में इसके विरुद्ध सिर्फ प्रतिपिंडों (एंटीबॉडी) का उत्पादन ही होता है। यदि इसका संचरण, मानव इन्फ्लूएंजा का कारण बनता है, तब इसे ज़ूनोटिक शूकर इन्फ्लूएंजा कहा जाता है। जो व्यक्ति नियमित रूप से सूअरों के सम्पर्क में रहते है उन्हें इस फ्लू के संक्रमण का जोखिम अधिक होता है। यदि एक संक्रमित सुअर का मांस ठीक से पकाया जाये तो इसके सेवन से संक्रमण का कोई खतरा नहीं होता। २०वीं शताब्दी के मध्य मे, इन्फ्लूएंजा के उपप्रकारों की पहचान संभव हो गयी जिसके कारण, मानव मे इसके संचरण का सही निदान संभव हो पाया। तब से ऐसे केवल 50 संचरणों की पुष्टि की गई है। शूकर इन्फ्लूएंजा के यह उपभेद बिरले ही एक मानव से दूसरे मानव मे संचारित होते हैं। मानव में ज़ूनोटिक शूकर इन्फ्लूएंजा के लक्षण आम इन्फ्लूएंजा के लक्षणों के समान ही होते हैं, जैसे ठंड लगना, बुखार, गले में ख़राश, खाँसी, मांसपेशियों में दर्द, तेज सिर दर्द, कमजोरी और सामान्य बेचैनी। चिन्ह व लक्षण सूअर में— शूकरों में शूकर इंफ्लूएंजा के मुख्य लक्षण— सूअरों में इन्फ्लूएंजा संक्रमण के कारण ज्वर, सुस्ती, छींक, खाँसी, साँस लेने में कठिनाई और भूख की कमी हो सकती है। कुछ मामलों में यह संक्रमण गर्भपात का कारण बन सकता है। हालांकि आमतौर पर मृत्यु सिर्फ 1-4% मामलों मे ही होती है। यह संक्रमण सूअर का वजन घटा और विकास को प्रभावित कर सकता है जो इनके पालको के आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है। संक्रमित सूअर का वजन 3 से 4 सप्ताह की अवधि के दौरान 5 से 6 किलोग्राम तक घट सकता है। मनुष्यों में शूकर इन्फ्लूएंजा का मुख्य लक्षण हैं: - ज्वर गले मे खरांश जुकाम खाँसी सिर व बदन दर्द जोड़ों में कठोरता उल्टी मूर्छा ठंड लगना कुछ मामलों में शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणु का संचरण, सूअरों से सीधे मनुष्यों मे होना संभव है, इस स्थिति मे इसे ज़ूनोटिक शूकर इन्फ्लूएंजा कहा जाता है। 1958 से लेकर अभी तक ऐसे सिर्फ 50 मामले ही रिपोर्ट हुये हैं, जिनमे से भी सिर्फ 6 व्यक्ति ही मृत्यु का ग्रास बने हैं। इन छह लोगों में से एक गर्भवती महिला थी, एक को ल्यूकिमिया था, एक हॉजकिन रोग का शिकार था और दो लोग पहले से स्वस्थ थे। भले ही यह प्रत्यक्ष मामले बहुत कम लगे पर वास्तविक संक्रमण की सही दर इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि ज्यादातर मामलों मे यह सामान्य रोग ही प्रतीत होता है और इस कारण इसे रिपोर्ट ही नहीं किया जाता। वर्गीकरण मानव इन्फ्लूएंजा के लिए उत्तरदायी, तीन वंशो के इन्फ्लूएंजा विषाणुओं मे से दो, सूअरों में भी इन्फ्लूएंजा फैला सकते हैं, जिसमे से इन्फ्लूएंजा ए तो बहुत आम है पर इन्फ्लूएंजा सी यदा कदा ही पाया जाता है। अभी तक इन्फ्लूएंजा बी को सूअरों में नहीं देखा गया है। इन्फ्लूएंजा ए और इन्फ्लूएंजा सी के भीतर मनुष्य और सूअरों में पाये जाने वाले उपभेद भिन्न होते हैं हालांकि पुन:पृथक्करण (रीअसोर्टमेंट) के कारण उपभेदों मे बड़े पैमाने जीन का स्थानांतरण देखा गया है चाहें यह सूअर, पक्षी या मानव प्रजाति में उपस्थित हो। इन्फ्लूएंजा सी इन्फ्लूएंजा सी विषाणु, मानव और सूअरों दोनों को संक्रमित करता है लेकिन इसका संक्रमण पक्षियों मे नहीं होता। अतीत मे भी इसका संचरण सूअरों और इंसानों के बीच हुआ है। उदाहरण के लिए, इन्फ्लूएंजा सी के कारण जापान और कैलिफोर्निया में बच्चों के बीच इन्फ्लूएंजा का कम प्रभावी प्रकार फैला था। अपनी सीमित परपोषी रेंज और आनुवंशिक विविधता की कमी के कारण इन्फ्लूएंजा सी मानव में महामारी का कारण नहीं बन पाया है। इन्फ्लूएंजा ए शूकर इन्फ्लूएंजा, इन्फ्लूएंजा ए के उपप्रकार एच1एन1,एच1एन2,एच3एन1,एच3एन2,और एच2एन3.के कारण होता है। पूरे विश्व मे सूअरों में, तीन इन्फ्लूएंजा ए विषाणु उपप्रकार एच1एन1, एच3एन2 और एच1एन2 सबसे आम हैं। पृष्ठभूमि एच१एन१ स्पैनिश फ्लु से आया, जो 1918 और 1919 के दौरान फैली एक महामारी थी जिससे लगभग 5 करोड़ लोग मारे गए थे। जो वायरस स्पैनिश फ्लु से आया वह सूअरों में विद्यमान रहा। इसका संचलन 20 वीं सदी के दौरान मनुष्यों में भी हुआ, यद्यपि यह वर्ष के उस समय होता है जब प्रतिवर्ष होने वाली महामारियाँ फैलती हैं, जिससे 'सामान्य' इंफ्लुएंजा और शूकर इंफ्लुएंजा में अंतर कर पाना कठिन है। हालांकि सुअरों से मनुष्यों में होने वाले संक्रमण के मामले बहुत विरल हैं और 2005 के बाद से अमेरिका में 12 मामले पाए गए हैं। शूकर इंफ्लुएंजा कहाँ पाया जाता है मनुष्यों में शूकर इंफ्लुएंजा यह शूकर के द्वारा मनुष्यों में फैला। बचाव हर किसी को अपना मुँह और अपनी नाक ढक कर रखना जरूरी है, खासकर तब जब कोई छींक रहा हो। बार-बार हाथ धोना जरूरी है। अगर किसी को ऐसा लगता है कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है तो उन्हें घर पर रहना चाहिये। ऐसी स्थिति में काम या स्कूल पर जाना उचित नहीं होगा और जहां तक हो सके भीड़ से दूर रहना फायदेमंद साबित होगा। अगर सांस लेने में तकलीफ होती है, या फिर अचानक चक्कर आने लगते हैं, या उल्टी होने लगती है तो ऐसे हालात में फ़ौरन डॉक्टर के पास जाना जरूरी है। खराब पानी से दूर रहे यदि किसी को यह बीमारी है, तो उससे कम से कम 1 मीटर की दूरी बनाकर रहें। यह बीमारी ठंड में अधिक फैलता है। दिन और रात का तापमान यदि 25॰C से ऊपर हो तो इसके विषाणु मर जाते हैं। वैद्य एस0के0यादव

Wednesday, December 10, 2014

लड़कियों की 'पसंद' ओरल सेक्स

नेशनल हेल्थ स्टैटिक सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार ‍ओरल सेक्स करने की प्रवृति टीनएजर्स में कम हो रही है, जबकि युवाओं में अब भी ओरल सेक्स का क्रेज़ बना हुआ है। अमेरिका में हाल ही में जारी हुई नेशनल हेल्थ स्टैटिक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले आंकड़ों की तुलना में टीनएजर्स में ओरल सेक्स करने प्रवृति में कमी आई है, लेकिन यंगस्टर्स में ओरल सेक्स करने की आदत आंशिक रूप से बढ़ी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़कों की तुलना में लड़कियां पहली बार सेक्स करने के दौरान ओरल सेक्स को प्राथमिकता देती हैं, क्योंकि वे प्रेग्नेंसी और अन्य यौन बीमारियों जैसे कॉन्ट्रेक्टिंग सेक्सुअल ट्रांसमिटेड डिसीज़ से बचना चाहती हैं। यौन बीमारियों और प्रेग्नेंसी से बचने के लिए लड़कियां मुख मैथुन करना पसंद करती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 से 24 वर्ष की आयु के बीच के दो तिहाई युवाओं ने आवश्यक रूप से ओरल सेक्स किया। लड़कियों ने खास तौर पर पहली बारी योनि संभोग से पहले कई बार ओरल सेक्स किया। सर्वे के अनुसार 26 प्रतिशत लड़कियों ने योनि संभोग से पहले ओरल सेक्स किया, जबकि 27 प्रतिशत लड़कियों ने एक बार योनि संभोग के बाद ओरल सेक्स का आनंद लिया । 7.4 प्रतिशत लड़कियां ऐसी भी रहीं, जिन्होने योनि संभोग और ओरल सेक्स का मज़ा एक साथ किया।
पेरेंटहूड फेडरेरेशन ऑफ अमेरिका की वाइस प्रेसिडेंट लेज़ली केंटर ने इस बारे में युवाओं के स्वास्थ्य पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ओरल सेक्स टीएएजर्स के लिए हौवा है। उन्हें यह जान लेना चाहिए कि यह पूरी तरह बीमारी मुक्त नहीं है। सर्वे में ओरल सेक्स से होने वाले संभावित खतरों पर चिंता भी जताई गई है। (एजेंसियां)

पश्चिम में न्यूड योगा की धूम

भारत वर्ष में ऋषि मुनियों ने हमेशा योग पर जोर दिया है। आज योग न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी प्रचलित हो रहा है,वैसे हमें इस बात पर गर्व हो सकता है कि भारत से शुरू हुई योग यात्रा विदेशों में भी चलन में आ रही है। लेकिन आपको ये जानकर बिल्कुल भी खुशी नहीं होगी की भारत का योग विदेशों में पहुंचकर न सिर्फ योगा हो गया है बल्कि इसको करने का तरीका भी बदल गया है, जी हां विदेशों में योगा न्यूड होकर करने का चलन बढ़ रहा है। आज न्यूड योगा का चलन यहां व्यवसाय का रूप लेता जा रहा है,अब ऐसे योग सेंटर खोले जा रहे हैं जिनमें योगा न्यूड होकर किया जाता है। फिलहाल न्यूड योगा क्लास सिर्फ पुरुषों के लिए है। यहां कई सेंटर ऐसे हैं भी हैं जहां महिलाएं को सिर्फ अंडर गार्मेंट्स में ही योगा कराया जाता है । इन देशों में अमेरिका कनाडा, यूके, स्पेन, आस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं। योग के इस बदलते रूप को इस तरह भी देखा जा सकता है कि भारत की संस्कृति योगवादी रही है और पश्चिम की भोगवादी इसलिए पश्चिमी देशों ने इसे अपनी भोगवादी और खुली संस्कृति के अनुसार ढाल लिया। यहीं नहीं न्यूड योग का चलन हॉलीवुड की अभिनेत्रियों में देखा जा रहा है।
इन देशों में न्यूड होकर योगा करने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे योगा ज्यादा जल्दी असर दिखाता है और इससे सेक्स क्षमता भी बढ़ती है,वैसे भारत में योगा का प्रचार बाबा रामदेव कर रहे हैं, उन्होंने कहा भी है कि योगा के प्रचार के लिए ग्लैमर जरूरी है लेकिन इससे इतना ग्लैमर जुड़ जाएगा ये तो उन्होंने भी नहीं सोचा होगा।
न्यूयॉर्क के योग स्टूडियो में पुरुषों की न्‍यूड योगा क्‍लास की लोकप्रियता से संकेत लेते हुए, अब इसके आयोजक नग्न योग के सहशिक्षण की पेशकश कर रहे हैं। बोल्ड एंड नेकेड (साहसी और नग्न) योग के नाम से जाने जाने वाले इस योग की पुरुषों और महिलाओं की सहशिक्षण कक्षाओं की समय सारिणी पेश की जाएगी।
मालिकों का कहना कि है यह पेशकश योग प्रशिक्षण के दौरान आरामदेह महसूस करने के लिए है और इस अवस्था में योग करने से आश्‍चर्यजनक आत्मविश्‍वास आता है। अपनी साथी मोनिका वर्नर के साथ स्टूडियो चलाने वाले वो जोस्ची श्‍वार्ज ने कहा कि यह शरीर के प्रति आपके नकारात्मक एहसास से आपको मुक्त करता है और आप खुद को अधिक स्वीकार करने वाले बनते हैं और खुद से गहराई तक जुड़ते हैं। इनकी वेबसाइट पर कहा गया है कि यह खुद को जानने, स्वीकार करने और प्यार करने के लिए है, योग का हिस्सा अपने शरीर का सम्मान करना और उससे जुड़ना है। वर्नर ने बताया कि जब वस्‍त्रहीनता की अवस्था में आपमें ज्यादा आत्मविश्वास आता है, तब कपड़े पहनने के बाद भी आप में उतना ही आत्मविश्वास बना रहता है।
भारत में सदियों से शरीर को स्वस्थ रखने के लिए योग किया जाता रहा है। आज भी भारत में योग करने वालों की तादाद लाखों में है। आपने भी योग की सभी विधियों को देखा या किया होगा, पर क्या आपने कभी न्यूड योग के बारे में सुना है। अगर नहीं तो आपको यकीन करना होगा कि दुनिया में ऎसी जगह भी है जहां न्यूड योग होता है। और वो भी कंबाइंड में यानि कि पुरूष-महिला एक साथ योग करते हैं। अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में यह योग एक योगा क्लासेज स्टूडियो में होता है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि जब से योग ने भारत की सरहदें लाँघी है तब से यह मर्यादा की सरहदें भी लाँघ चुका है। अमेरिका में योग का योगा होते-होते अब योग और भोग का समन्वय होने लगा है अर्थात भोगवादी संस्कृति और योगवादी संस्कृति दोनों ही मिलकर विश्व में नया बाजार तलाश करने में जुट गई है। योग पर अब ग्लैमर के रंग के साथ ही सेक्स का रंग इसलिए चढ़ाया जाने लगा है कि योग के सारे आसन और प्राणायाम को एक प्रोडक्ट बनाकर बेचा जा सके। इसीके चलते न्यूड योगा, हॉट योगा और सेक्सी योगा आदि के नाम से जहाँ योगा क्लास संचालित हो रही है।
                                                                                                                         वैद्य एस0के0यादव

Saturday, December 6, 2014

आपका बच्चा जब पूछे ऐसा सवाल...



आपका बच्चा जब पूछे ऐसा सवाल...
बच्चे कई बार सेक्स संबंधित ऐसे सवाल पैरंट्स से पूछ बैठते हैं, जिनका जवाब देना उलझन भरा काम होता है। कई बार मां-बाप ऐसे सवालों को टाल जाते हैं तो कई बार बच्चों को डांट देते हैं। दोनों ही चीजें बच्चे के मानसिक विकास के लिए नुकसानदायक हैं। फिर क्या करें ? बच्चे के ऐसे हर सवाल का खास तरीके से जवाब दें। कैसे, एक्सपर्ट्स से मिली जानकारी के आधार पर हम आपको बता रहे हैं—
4-9 साल के बच्चों के सवाल 
बच्चे कहां से आते हैं ? मैं कहां से आया ? पड़ोस वाली आंटी का पेट बड़ा क्यों है ?( प्रेगनेंट महिला को देखकर)
यह एक ऐसा सवाल है, जो इस उम्र के लगभग हर बच्चे के दिमाग में उठता है। ऐसे सवाल पूछने पर बच्चे को डांटना या उसकी बात को आई-गई करना ठीक नहीं है, क्योंकि इस जिज्ञासा को अगर आपने शांत नहीं किया तो वह कहीं और से जानने की कोशिश करेगा और ऐसे में बहुत मुमकिन है कि वह भ्रमित हो जाए। इस उम्र के बच्चे कुदरत और जानवरों के उदाहरणों से किसी बात को अच्छी तरह समझ लेते हैं। ऐसे में इस सवाल का जवाब देने के लिए आप उसे कहीं गार्डन या बाहर वॉक पर ले जाएं। फूलों का उदाहरण देकर समझाएं कि कैसे वे पैदा होते हैं और फिर मां के शरीर से अलग होकर खुद अपनी बढ़ोतरी करते हैं। आप उसे सीधे-सीधे यह भी कह सकते हैं कि तुम्हारी मां के शरीर में एक खास अंग है , जिसे गर्भाशय कहते हैं। तुम वहीं से आए हो। इस उम्र में जन्म की पूरी प्रक्रिया के बारे में बताने की जरूरत नहीं है और न ही ऐसी कोई बात बच्चे को कहें कि वह भगवान के यहां से आया या उसे किसी साधु बाबा के यहां से लाए थे। उसे साफ-साफ बताएं कि वह मां के शरीर से पैदा हुआ है। प्रेग्नेंट महिला के बारे में भी बता सकते हैं कि इसी तरह उन आंटी के शरीर से भी एक बेबी पैदा होगा ।
अगर बच्चा पैरंट्स की शादी की ऐल्बम देखकर)कहे इसमें सबकी फोटो है,मेरी क्यों नहीं है ? तो इस सवाल को हैंडल करने के कई तरीके हो सकते हैं। 4-6 साल के बच्चों को असली बात समझा पाना मुश्किल है। इस सवाल का जवाब कुछ इस तरह दे सकते हैं कि तुम्हें तब तक मां-पापा इस दुनिया में लाए ही नहीं थे। भ्रमित करने वाले जवाब देने से बचना चाहिए।
लड़कियों और लड़कों के प्राइवेट पार्ट्स अलग-अलग क्यों होते हैं ? ( कई बार बच्चे एक-दूसरे के कपड़ों में झांकते हैं और उनकी जिज्ञासा बढ़ती है।)
इतनी छोटी उम्र में आप बच्चे को शरीर के अंगों की जानकारी नहीं दे सकते। इसलिए उसे समझाएं कि दुनिया में हर शख्स अलग होता है और अलग ही दिखाई देता है। ईश्वर ने हर शख्स को अलग-अलग बनाया है और इसीलिए उनके शरीर की बनावट भी अलग होती है। मसलन लड़कों के शरीर की बनावट अलग होती है और लड़कियों के शरीर की अलग। इसी तरह कुत्ता, बिल्ली, गाय, भैंस और भी तमाम जीव अपने आप में खास होते हैं। तुम लड़के हो और तुम्हारे अंग लड़कियों से अलग बनाए गए हैं।
 सैनिटरी नैपकिन के बारे में पूछना कि यह क्या है ? 
सैनिटरी नैपकिंस के बारे में पूछने पर बच्चों को बता सकते हैं कि ये नैपकिन हैं। जैसे नाक या हाथ पोंछने के लिए तुम सामान्य नैपकिन का इस्तेमाल करते हो , उसी तरह शरीर के प्राइवेट पार्ट्स को पोंछने और उन्हें साफ रखने के लिए मां इनका इस्तेमाल करती है। ये नैपकिन उन नैपकिन से थोड़े अलग होते हैं जिनका इस्तेमाल तुम करते हो, लेकिन इनका काम वही है। इस उम्र में इससे ज्यादा बच्चे को बताने की जरूरत नहीं है।
कॉन्डोम क्या होता है ? ( टीवी आदि में ऐड देखकर)
कॉन्डोम के बारे में बच्चे की जिज्ञासा बेहद नॉर्मल है। अगर घर में कॉन्डोम को छिपाकर भी रखा जाए तो भी इस बात की पूरी संभावना है कि बच्चे टीवी ऐड या सड़कों पर लगे विज्ञापनों के जरिए इस शब्द से परिचित हो चुके हों और इस बारे में आपसे जानने की कोशिश करें। इतने छोटे बच्चों को बता सकते हैं कि जैसे हाथों को किसी बीमारी से बचाने के लिए हम ग्लव्स पहन लेते हैं, उसी तरह कॉन्डम भी एक ग्लव्स की तरह होता है, जो पुरुषों को बीमारियों से बचाता है। अगर बच्चा 14-15 साल के आसपास है तो उसे यह भी कह सकते हैं कि कॉन्डम सेक्स के दौरान पुरुषों को बीमारी से बचाने और बेबी होने से रोकने के काम आता है। सेक्स शब्द का प्रयोग करने से घबराएं नहीं, क्योंकि बच्चे को शिक्षा देने के लिए एक-न-एक दिन इस शब्द का इस्तेमाल करना ही है।
9-14 साल के बच्चों के सवाल
मेरे शरीर में ये अचानक बदलाव क्यों आ रहे हैं ? मसलन दाढ़ी मूंछ आना , प्राइवेट पार्ट्स पर बाल, मुहांसों की शुरुआत आदि।
14-15 साल की उम्र किसी बच्चे को यौवन के बारे में जानकारी देने का सही समय है। बच्चों को सबसे पहले इस बात का एहसास दिलाया जाए कि उनके शरीर में जो भी बदलाव आ रहे हैं, वे बिल्कुल नॉर्मल हैं और जरूरी भी। उन्हें बताएं कि तुम्हारे शरीर के विभिन्न अंगों पर आने वाले बाल, आवाज में आने वाला बदलाव, मुंहासे निकलना आदि सभी कुछ नॉर्मल है और ऐसा हॉर्मोनल बदलाव की वजह से हो रहा है। ऐसा सभी के साथ होता है। हमारे साथ भी ऐसा हुआ था। लड़कियों और लड़कों दोनों में ही ऐसे बदलाव आते हैं, हालांकि कुछ चीजें लड़कों और लड़कियों दोनों में अलग-अलग हो सकती हैं।
पीरियड्स क्या होते हैं ?
यह जानना जरूरी है कि लड़कियों को पीरियड्स की जानकारी उस समय ही दे दी जानी चाहिए, जब उनके पीरियड्स शुरू नहीं हुए हों और होने वाले हों। यह ऐसा सवाल है, जिसका जवाब मां को बेटी के पूछने से पहले ही दे देना है। ऐसी अवस्था कौन-सी होगी, इसका फैसला मां से बेहतर कोई नहीं कर सकता, फिर भी आमतौर पर 14 साल की उम्र यह सब जानकारी देने के लिए ठीक है। इस बारे में जानकारी देने का काम मां खुद करे । उन्हें बताया जा सकता है कि यह नॉर्मल है और सभी लड़कियों के साथ ऐसा होता है। बेटियों के साथ मां अपना पर्सनल अनुभव भी शेयर कर सकती हैं और उन्हें सभी बातें विस्तार से बता सकती हैं। मां उन्हें बता सकती हैं कि उनके साथ भी जब ऐसा हुआ था, तो उन्हें भी अजीब-सा लगा था और दर्द भी हुआ लेकिन बाद में यह बिल्कुल नॉर्मल चीज बन गई।
बच्चा कैसे पैदा होता है ?  
इस उम्र तक आते-आते बच्चे की समझ इतनी विकसित हो जाती है कि वह बच्चा पैदा होने के बारे में थोड़ा-बहुत समझ ले। उसे बता सकते हैं कि बच्चा मां के पेट में होता है। जब बच्चा पैदा होने वाला होता है तो मां के पेट के अंत में मौजूद सर्विक्स फैलने लगती है। वहां की मांसपेशियां बच्चे को बाहर धकेलने लगती हैं और बच्चा मां के प्राइवेट पार्ट के जरिए बाहर आ जाता है।
बाल यौन शोषण(चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज)
बच्चों का यौन शोषण करने वाले लोग दिखने में सामान्य ही होते हैं, लेकिन देखा गया है कि ऐसे लोग बच्चों के साथ जरूरत से ज्यादा वक्त बिताते हैं और उनके साथ ज्यादा घुलने-मिलने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों को पकड़ना या उनकी पहचान कर पाना आसान नहीं है। कई बार ऐसे लोग आपके बेहद नजदीकी भी हो सकते हैं, जिन पर आप शक भी नहीं कर पाएंगे। ऐसे में बेहतर यही है कि बच्चे को बाल यौन शोषण के बारे में परिचित कराएं और उसे साफ-साफ बताएं कि अगर कोई भी उसके साथ ऐसी हरकत करता है तो वह फौरन आपको बताए।
ऐसे समझाएं बच्चे को 
यौन शोषण से बच्चे खुद को बचा सकें, इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि उन्हें पूरी सेक्स एजुकेशन ही दी जाए। देखिए, एक जागरूक और समझदार मां अपनी  बेटी को कैसे बता सकती है इस सबके बारे में। आप भी यह तरीका अपना सकते हैं:—
- बेटा, टच तीन तरह के होते हैं। गुड टच, बैड टच और सीक्रेट टच।
- गुड टच वह टच होता है, जिससे तुम्हें खुशी मिलती है। जैसे कोई तुम्हें गले से लगा ले, तुमसे हाथ मिला ले, तुम्हारी पीठ थपथपा दे या हाई फाइव करे।
- दूसरी तरफ बैड टच तुम्हें परेशान करता है। इससे तुम्हें बुरा लगता है। मसलन कोई तुम्हें नोच ले, चिकोटी काट ले या किक मार दे।
- अब बात सीक्रेट टच की। सीक्रेट टच के दो हिस्से होते हैं। पहला हिस्सा यह है कि यह टच तुम्हारे प्राइवेट पार्ट्स पर किया जाता है यानी शरीर के उन हिस्सों पर जो स्विम सूट पहनने के दौरान कवर हो जाते हैं। मोटे तौर पर ये तीन अंग हैं। सीना, बॉटम और आगे का हिस्सा। याद रखो ये प्राइवेट हिस्से हैं और इन्हें देखने और टच करने का अधिकार किसी को नहीं है। सीक्रेट टच का दूसरा हिस्सा यह होता है कि ऐसा टच करने वाला व्यक्ति तुम्हें यह कहेगा कि इस बात को किसी को मत बताना। हो सकता है, वह तुम्हें डराए और धमकाए कि यह बात किसी को नहीं बतानी है। यहां यह जानना जरूरी है कि नहलाते वक्त मां ऐसा कर सकती है। वह सीक्रेट टच नहीं है क्योंकि वह कभी नहीं कहती कि यह बात किसी को बताना मत। इसी तरह डॉक्टर अगर तुम्हें इन जगहों पर टच करते हैं, तो वह भी सीक्रेट टच नहीं है क्योंकि डॉक्टर भी यह कभी नहीं कहते कि यह किसी से कहना मत। हालांकि डॉक्टर तुम्हारे इन अंगों को चेक तभी कर सकते हैं, जब तुम्हारे मां या पापा में से कोई साथ हो। लेकिन अगर कोई शख्स तुम्हें ऐसी जगहों पर टच करे और तुम्हें धमकाए या कहे कि यह बात किसी को मत बताना तो यह बात तुम्हें फौरन अपने मम्मी या पापा को जरूर बतानी है।
एक्सपर्ट्स से पूछें 
हर बच्चा अपने आप में यूनीक है और हर बच्चे के मन में उठने वाले सवालों का स्तर भी। हमने कई आम सवालों को छूने की कोशिश की है, फिर भी अगर आपका बच्चा कोई ऐसा सवाल पूछता है जिसका यहां जिक्र होने से रह गया है, तो आप हमें अपना सवाल हिंदी या अंग्रेजी में लिख सकते हैं। मेल करें: socialsamvad@gmail.com पर। हमारे एक्सपर्ट आपको बताएंगे कि उस सवाल का सही जवाब बच्चे को कैसे दिया जाए।
कुछ उलझन भरी स्थितियां 
- अगर बच्चा पैरंट्स को लवमेकिंग करते देख ले। 
अगर बच्चा पैरंट्स को प्राइवेट पलों में देख ले, तो उसके मन पर इसका गहरा असर हो सकता है। ऐसे में उसे हर बात समझाना जरूरी है। अगर पैरंट्स ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि बच्चे के सामने आ सकें और बच्चा अचानक कमरे में आ जाता है, तो हड़बड़ाएं नहीं। उसे आराम से कह दें, बेटा अभी मां-पापा को प्राइवेट टाइम चाहिए। अभी अपने कमरे में चले जाओ, तो कुछ ही मिनट में हम आपसे बात करेंगे। बाद में बच्चे को समझाएं कि मां-पापा एक-दूसरे को प्यार कर रहे थे। ऐसा करते वक्त हम दरवाजा बंद कर लेते हैं क्योंकि यह सब प्राइवेट होता है, लेकिन आज हम दरवाजा बंद करना भूल गए। अब बच्चे के रिएक्शन देखें। अगर बच्चा अभी भी परेशान है तो उसे समझाएं कि न तो उसने ऐसे अचानक आकर कोई गलती की है और न ही मां-पापा कोई गलत काम कर रहे थे। यह सब नॉर्मल है। कोशिश करें कि बच्चे के मन में कहीं भी यह भाव न पनपने पाए कि पापा मां को परेशान कर रहे थे।
- अगर टीवी देखते हुए कोई लवमेकिंग या किसिंग सीन आ जाता है। 
टीवी देखते वक्त अगर अचानक किसिंग या लवमेकिंग सीन आ जाए तो हड़बड़ाएं नहीं और न ही टीवी बंद करने या चैनल बदलने की कोशिश करें। सहज भाव से उसे वैसे ही चलने दें और जब सीन खत्म हो जाए तो बच्चे को देखें। अगर वह असहज है या खुद ही उसके बारे में पूछ बैठता है तो इसे शिक्षा देने का एक मौका समझें। बच्चे को उसकी उम्र के मुताबिक, इस बारे में समझा सकते हैं। मसलन ये लोग आपस में प्यार कर रहे थे या यह दो बड़े लोगों के बीच प्यार करने का एक तरीका होता है। अगर आप असहज हो गए या चैनल बदला तो बच्चे पर गलत असर हो सकता है, लेकिन उसे सही सूचना देने से उस पर गलत असर कभी नहीं होगा।
- अगर बच्चा बड़ों को कपड़े बदलते या नहाते चुपचाप देखने की कोशिश करता है। 
जिज्ञासा के चलते बच्चे छुपकर बड़ों को कपड़े बदलते या नहाते देखने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसा होना नॉर्मल है। ऐसे में, उन्हें समझाएं कि यह गलत बात हैं। किसी को भी छिपकर नहीं देखना चाहिए। उनसे कहें- तुम्हें भी यह अच्छा नहीं लगेगा कि तुम्हें कोई छिपकर देखे। इसलिए तुम्हें भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए। भूलकर भी बच्चे को डांटें नहीं। उसे यह एहसास न होने दें कि उसने कोई गलत काम कर दिया है। अगर बच्चे को थोड़ी समझ है तो इस मौके पर उसे पुरुष और स्त्री के अंगों के बारे में भी थोड़ी जानकारी दी जा सकती है।
समझाते वक्त पैरंट्स रखें ध्यान
- बच्चे को सेक्स से संबंधित ज्ञान देने की कोई उम्र नहीं होती। यह हर बच्चे के स्तर पर निर्भर करता है। वैसे बच्चे की सेक्स एजुकेशन तभी शुरू हो जाती है , जब वह पालने में होता है।
- बच्चे जब भी सेक्स से संबंधित कोई सवाल पूछें तो उसे एक ऐसे मौके के तौर पर देखना चाहिए, जब आप बच्चे की सेक्स एजुकेशन की शुरुआत कर सकते हैं।
- बच्चे जब भी इस तरह के सवाल पूछें, तो कोशिश यह होनी चाहिए कि उनके इन सवालों के जवाब एकांत में दिए जाएं। अगर बच्चा किसी के सामने सवाल पूछ बैठता है तो उसे प्यार से कह दें कि इसके बारे में हम तुम्हें बाद में बताएंगे और फिर इस वादे को पूरा करें।
- किसी भी सवाल का जवाब इस अंदाज में न दिया जाए, जो बालक की भावनाओं को भड़काए या उत्तेजित करे।
- बच्चे के साथ सख्त और गैर-दोस्ताना रवैया न रखें। आप जो भी बता रहे हैं , वह उसके विकासकाल के मुताबिक होना चाहिए। वैसे ज्यादा ज्ञान भी दे देंगे तो उसका कोई नुकसान नहीं होगा। ज्ञान कभी हानिकारक हो ही नहीं सकता।
- बच्चा अगर शांत स्वाभाव का है तो उसे इस विषय की ज्यादा बातें बता सकते हैं, जबकि चंचल बच्चों को थोड़ा कम ज्ञान देना ही ठीक रहता है।
- अगर कभी बच्चे के किसी सवाल का जवाब मालूम नहीं है या उसने कोई ऐसा प्रश्न पूछ डाला जिसका जवाब देने में आप झिझकते हैं या देना नहीं चाहते तो आप उससे कह सकते हैं - तुम्हारा सवाल बहुत अच्छा है, लेकिन हमें भी इसका जवाब पता नहीं है। हम इसका जवाब मालूम करने की कोशिश करेंगे और फिर तुम्हें बताएंगे।
- ध्यान रखें मां-बाप का आपस में और बच्चे के प्रति जैसा बर्ताव होगा, बच्चा सेक्स संबंधी ज्ञान को उसी के अनुरूप लेगा। जिन मां-बाप के बीच प्रेम होता है और जो बच्चे को भी इस बात का एहसास कराते हैं कि वे उसे बहुत प्यार करते हैं , उनके बच्चों के सेक्स संबंधी ज्ञान में ज्यादा और बेहतरीन तरीके से बढ़ोतरी होती है।
                                                                                                                           वैद्य एस0के0यादव

जब आपका बच्चा पहली बार जाए स्कूल


जब आपका बच्चा पहली बार जाए स्कूल
अगर आपका बच्चा पहली बार स्कूल जा रहा है, तो ज्यादा हाय-तौबा न मचाएं। बस कुछ बातों का ध्यान रखें, ताकि उसे स्कूल में कोई दिक्कत न आए—
आपके बच्चे का नर्सरी क्लास में एडमिशन हो गया है, तो लाजिमी है कि इन दिनों आप लगातार इसी फिक्र में घुल रहे होंगे। सोच रहे होंगे कि बच्चे को क्या पहनाएं, किस तरह का बैग लें, हेयर कटिंग कैसी हो, टिफिन में क्या भेजें वगैरह। ऐसी कशमकश उन पैरंट्स में ज्यादा देखने को मिलती है, जो पहली बार बच्चे को स्कूल भेज रहे होते हैं। आखिर हो भी क्यों न, उनका भी तो यह फर्स्ट एक्सपीरियंस होता है, जिससे वह कई चीजों को लेकर कन्फ्यूजन में रहते हैं।
चाइल्ड स्पेशलिस्टों का कहना है कि पहले बच्चे के दौरान पैंरट्स इस प्रेशर में रहते हैं कि क्या करना ठीक रहेगा और क्या नहीं। बच्चे को स्कूल में कोई दिक्कत न आए, वह क्लास में किसी वजह से दूसरे बच्चों से पीछे न रहे, यह प्रेशर उनको ओवर कॉन्शस रखता है। इसके चलते वे बच्चे को लेकर कभी- कभार ओवर प्रोटेक्टिव भी हो जाते हैं।
अगर आपका बच्चा भी पहली बार स्कूल जा रहा है, तो परेशान न हों, बस रखें कुछ बातों का ध्यान —
- अगर स्कूल यनिफॉर्म है, फिर तो कोई झंझट नहीं। अगर नहीं है, तो रोजाना साफ- सुथरी ड्रेस पहनाकर भेजें। चूंकि बच्चा अभी छोटा है, तो बैग में नैपकिन जरूर रखें, ताकि हाथ गंदे होने पर वह साफ कर पाए।
- बच्चे का आई कार्ड जेब पर रखना कतई न भूलें। यह आपके बच्चे की आइडेंटिटी है। दरअसल, इसमें बच्चे की क्लास, सेक्शन वगैरह लिखा होता है। अगर बच्चा क्लास से बाहर कहीं निकल भी गया और वापस क्लास में नहीं पहुंच पा रहा है, तो इसकी हेल्प से स्कूल में कोई भी उसे आसानी से उसकी क्लास व बस तक पहुंचा देगा।
- बच्चे को स्कूल बस के समय से तकरीबन 50 मिनट पहले उठा लें। ताकि उसे तैयार होने तक पूरा समय मिल सके। लेकिन एक बात का ध्यान रखें कि वह सुबह समय पर तभी उठेगा, जब आप रात को उसे आप समय पर सुलाएंगी।
- बच्चे के लिए 8 से 10 घंटे की नींद बेहद जरूरी है। इसलिए रात को उसे उसी हिसाब से सुलाएं। अगर उसकी नींद पूरी नहीं होगी, तो उसका ध्यान क्लास एक्टिविटीज में नहीं लग पाएगा।
- बच्चे का स्कूल टिफिन तैयार करना किसी बड़े झंझट से कम नहीं होता। समझ में नहीं आता कि रोज क्या बनाएं, जो हेल्दी तो हो ही और बच्चा भी खुशी से खा ले। लेकिन प्लानिंग से आप इसका ध्यान रख सकते हैं। टिफिन में फ्रूट्स डालें , लेकिन इस तरह से कि उसे खाने में मजा आए। बच्चे के मनपसंद फ्लेवर लगाकर सैंडविच को फैंसी शेप में काटें। शुरू में टिफिन में उसकी मनपसंद चीजें रखें। जब उसे एक बार टिफिन की आदत पड़ जाए, तो फिर धीरे- धीरे उसका टेस्ट दूसरी चीजों की तरफ डिवेलप करें।
- घर आकर एक बार उससे दिनभर की एक्टिविटीज पर जरूर डिस्कस करें। इससे बच्चे को लगेगा कि आपको भी उसकी स्कूल एक्टिविटीज में इंटरेस्ट है।
- उसकी सभी चीजों को गौर से सुनें। अच्छी चीजों पर उसकी तारीफ करें। लेकिन गलत चीजों पर डांटे नहीं और न ही उस समय रिएक्ट करें। फिर कभी जब बच्चा अच्छे मूड में हो, तो उसे प्यार से उस बात को लेकर गलत व सही समझाएं।
- उससे उसकी फ्रेंड्स के बारे में भी बातचीत करते रहें। इससे आपको पता चलता रहेगा कि आपका बच्चा किस तरह के फ्रेंड सर्कल में मूव कर रहा है और किन विषयों में इंटरेस्ट ले रहा है।
- बच्चों के बिहेवियर पर नजर रखें। अगर आपको कुछ नेगेटिव चेंज नजर आ रहे हैं, तो तुरंत जाकर टीचर्स से मिलें। इससे आप समय रहते ही चीजों को संभाल पाएंगे।
- अगर बच्चा किसी वजह से परेशान है, तो उस समय उसे समस्या को हल करने का सही तरीका बताएं। एक- दो बार ऐसे एक्सपीरियंस के बाद उसमें समस्याओं से लड़ने की ताकत आ जाएगी और फिर वह बड़ी से बड़ी दिक्कतें भी बिना किसी तनाव के हल कर लेगा।
                                                                                                                  वैद्य एस0के0यादव